सेक्स जीवन का क्या है सच?


मैं ठीक नहीं हूं। पहले मैं कितनी सुंदर     थी। चेहरा बिलकुल चिकना और सापफ-सुथरा था। मैं तुम्हें अब अच्छी नहीं लगती हूं न?’ दीपा ने अपने पति हरीश से पूछा तो पहले तो वह हंसा, पिफर वह भी दीपा की आंखों से ही उसे देखने लगा-‘हां, तुम पहले की तरह खूबसूरत नहीं हो।’ कहकर हरीश चुपचाप सो गया। दीपा ने एक-दो बार उसे छेड़ा तो वह भारी मन से बोला-‘न जाने  क्यों आजकल तुम्हारे होने न होने का मुझ पर कोई असर ही नहीं होता है। तुम्हारी ब्यूटी की तरह ही मेरी यौनोत्तेजनाएं भी ध्ूमिल पड़ गई हैं…’ हरीश ने यह कहकर दीपा के मन में और भी अध्कि हीनभावना भर दी।
पति या पत्नी में से जब कोई एक अपने आप के बारे में निगेटिव सोच बना लेता है तब दूसरा भी उसी रंग में रंग जाता है। वह यह
स्वीकार कर लेता है कि उसका पार्टनर पहले जैसा नहीं है। यह सोच सेक्स जीवन को प्रभावित करती है। मन में यौनेच्छा बनती ही नहीं है। प्रौढ़ावस्था में वैसे भी जोश ठंडा पड़ जाता है और इच्छाएं होते हुए भी व्यक्ति कुछ कर नहीं पाता है और जब ऐसे में पत्नी अपने पति के सामने अपने रूप-सौंदर्य में कमियां निकालने लग जाती है तब पति उसकी ही आंखों से उसे देखने लगता है। इसमें पति का कोई कसूर नहीं होता है। ऐसे में उसे पत्नी से अरुचि सी हो जाती है।
मन में अपने रूप-सौंदर्य के बारे में जो भी सोचना है आप बेशक सोचें, पर पति के आगे इसकी चर्चा न करें। इससे उसमें स्वाभाविक रूप से ठंडापन आ जाता है। पिफर आप का सजना-संवरना या उससे प्यार करना कोई भी जादू नहीं चला पाता है। इस सच को तो आप सभी जानते हैं कि जो खूशबू, जो मादकता, जो रूप-सौंदर्य, जो शारीरिक सुडौलता युवा अवस्था में होती है, वह दो-तीन बच्चों की मां बनने या उम्र ढल जाने के बाद कायम नहीं रह पाती है। यह बदलाव सिपर्फ पत्नी में ही नहीं होता है, पति में भी इस तरह का बदलाव आ जाता है। बढ़ती उम्र, हारी-बीमारी, तनाव और नाना प्रकार की समस्याएं स्वास्थ्य तथा सौंदर्य दोनों पर ही अपना गहरा प्रभाव छोड़ जाती हैं। आप लाख जतन करने के बाद भी स्वयं को वैसा बनाए नहीं रख पाते हैं जैसा आप शादी के शुरुआती दिनों में थे। ये बदलाव मन ही मन स्वीकार करने के लिए होते हैं, सबको बताने के लिए नहीं। जब आप खुद अपनी कमियों का जिक्र पति के सामने करेंगी तो यह स्वाभाविक है कि वह भी आपको उसी नजर से देखना शुरू कर देगा। आपको शायद यह नहीं पता, सेक्स का संबंध् मन और आंखों से शरीर की अपेक्षा अध्कि होता है। जब पति की आंखें पत्नी को बदसूरत मान बैठती हैं, तब मन भी पत्नी को सेक्स के लिए उपयुक्त नहीं स्वीकार कर पाता है।
दीपा हरीश के लिए कल तक तो बिलकुल ही परपफेक्ट थी। उसमें कोई कमी ही नहीं थी। अपनी कमियों को जब दीपा ने खुद बताया तब कहीं जाकर हरीश को दीपा में कमियां नजर आईं। पिफर उसे उससे अरुचि हो गई। वह उससे एक दूरी बनाकर उसके साथ रहने लगा। इस दूरी ने हरीश को यौन-ठंडेपन का शिकार बना दिया। आज की यह एक सबसे बड़ी समस्या है। इच्छा है पर जोश नहीं है। जोश क्यों नहीं है?इसका कारण दीपा और हरीश की बातचीत से सापफ जाहिर हो जाता है।
अध्किांश पत्नियां अपने पतियों को दीपा की तरह ही सोच मन में पालकर यौन-ठंडेपन का शिकार बना देती हैं और उफपर से यह रोना भी रोती हैं कि पति उन पर ध्यान नहीं देते या उनमें कोई रुचि नहीं लेते।
अपने शरीर को लेकर जो भी नकारात्मक विचार हैं उनको परे करें। उनको अपने बेडरूम में या सेक्स जीवन में कोई जगह न दें। यह तो स्वाभाविक बदलाव है, इसे आप क्या कोई भी रोक नहीं सकता है। इसे स्वीकार कर खुद को भरसक इतना बुलंद करें कि पति को यह अहसास ही न हो कि आप पहले वाली सुघड़ एवं चंचल युवा स्त्राी नहीं हैं।
बढ़ती उम्र आप के शरीर को प्रभावित कर सकती है, पर मन को भी प्रभावित करे यह संभव नहीं है क्योंकि मन की चपलता और चंचलता को बढ़ती उम्र छू तक भी नहीं पाती है। यह तो आप हैं कि मन को उसकी गिरफ्रत में लाती हैं। मन और सोच को बढ़ती उम्र के गिरफ्रत में न आने दें। मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। दीपा मन से हार गई है। उसने यह कबूल कर लिया है कि वह पहले जैसी खूबसूरत और जवान नहीं है। यह सोच तो युवा व्यक्ति को भी बुढ़ापे में ला सकती है। कहने का तात्पर्य है कि आप अपने विचार को नकारात्मक न होने दें। हमेशा सकारात्मक सोचें और कोई गलती से भी यह कह दे कि आप पहले जैसी अब नहीं लगती हैं तो इसे स्वीकार न कर उसे यह समझाने का प्रयास करें कि मुझे तो पफर्क नजर नहीं आ रहा है। मैं तो पहले से कहीं बेटर पफील करती हूं।
और यह सच भी है। उम्र के साथ-साथ व्यक्ति के अनुभव में
जो इजापफा होता है, उससे उसकी लाइपफ और आसान व हसीन हो
जाती है। जो कार्य पहले वह ताकत के बल पर करता आ रहा था,
उसे अब वह अनुभव के बल पर और भी बेहतर ढंग से करने की कोशिश करता है।

दम भी नहीं फुर्सत भी नहीं पत्नी कैसे रहेगी खुश

tired men

आज अध्किांश स्त्राी-पुरुष दिन भर काम को लेकर व्यस्त रहते हैं पर उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं होता है। घर में अचानक आयी बीमारी, किसी पर्व-त्योहार या बच्चों के भविष्य पर खर्च करने के लिए आपके पास पैसे न हों तो आप चिंतन-मनन कीजिए। ऐसे मौकों पर भी जब आपके हाथ में जीरो है तो पिफर आपसे आपके बीवी-बच्चे कैसे जुड़े रह सकते हैं?
चल रहे हो मंदिर?’ स्मिता ने बेडरूम में आते हुए पूछा।
नीतेन ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। स्मिता ने पिफर टोका, ‘चलो बच्चे भी जिद कर रहे हैं।’
‘तुम्हीं चली जाओ न उनको लेकर… देख नहीं रही हो कितना काम है।’ नीतेन ने काम की मजबूरी सामने रखी तो स्मिता बिदक गई, ‘काम तो बस एक तुम्हीं करते हो और मर्द तो करते ही नहीं हैं।’ यह कहकर स्मिता किचन में चली गई।
नीतेन भी किचन में आ गया और उसे समझाने लगा, ‘मंदिर ही जाना है न, बच्चों को लेकर घूम आओ।’
‘जाने दो, मैं भी नहीं जा रही। तुम्हें तो जीवन भर काम से पुफर्सत ही नहीं मिलनी है, तो क्या हम कहीं घूमने-पिफरने नहीं जाएंगे?’
‘मंदिर जाने पर मेरा सारा दिन खराब हो जाएगा। वहां लम्बी लाइन लगती है।’ नीतेन ने शुष्क लहजे में कहा तो स्मिता चीख पड़ी, ‘दिन-रात तुम काम-काम करते रहते हो… कुछ ऐसा किया भी है?जब भी पैसा मांगो जेब झाड़ देते हो। देखो, तुम मेरी बात मानो या न मानो लेकिन यह सच है कि तुम इस तरह से स्वयं को मेहनत की भट्ठी में झोंक कर हमारी  तो क्या, अपनी जरूरतें भी पूरी नहीं कर सकोगे?’
नीतेन का चेहरा उतर गया। माथे पर पसीने की बूंदें उग आयीं। कड़वा सच व्यक्ति का ऐसा ही हाल कर देता है। नीतेन पत्नी के करीब आकर बोला, ‘गुस्से में ही सही, पर तुमने आज काम की बात की है। लेकिन मैं ऐसा करूं क्या कि नोटों की बारिश हो…?’
‘अपनी मेहनत को सही दिशा में लगाओ। अपने काम की कीमत को समझो। आगे बढ़ना है तो रिस्क लेना सीखो। बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनके पास टाइम भी होता है और पैसा भी होता है। तुम्हारे पास तो टाइम भी नहीं है और पैसा भी नहीं है। बच्चे छोटे हैं नहीं तो मैं भी कुछ करने के बारे में सोचती…’ कहकर स्मिता चुप हो गई।
नीतेन अगले पल ही मुस्करा पड़ा, ‘बच्चे तैयार हैं तो चलो अभी निकल चलते हैं मंदिर… काम तो होता रहेगा… समस्याएं पीछे लगी रहेंगी… पुफर्सत तो मरते दम तक नहीं मिलने वाली… लेकिन बच्चे तो हमेशा छोटे नहीं रहेंगे… तुम तो जवां नहीं रहोगी। मैं पैसे कमाने के लिए आज से देह का नहीं बल्कि दिमाग का इस्तेमाल करूंगा…’
नीतेन मंदिर जाने के लिए तैयार हो गया। स्मिता उसे अच्छी लगने लगी। काम का तनाव नीतेन के दिमाग से छंट गया।
टाइम और काम को लेकर अध्किांश पति अपनी पत्नी को
नाराज कर देते हैं। आज उन्हीं के टाइम और काम को सुना या बर्दाश्त किया जाता है जो मोटी रकम कमाते हैं। ऐसे पतियों की बातें पत्नियां
नहीं सुनतीं, जो दिन-रात मेहनत तो करते हैं पर उसके हिसाब से
कमाते नहीं हैं।
यह कुछ हद तक सही भी है। पति दिनभर आॅपिफस में हाड़तोड़ मेहनत कर घर आया और आते ही पुनः काम करने बैठ गया। पत्नी ने पैसे मांगे या बच्चों ने कोई चीज खरीदने की जिद की और पति ने पैसे और पुफर्सत न होने का रोना रोकर उन्हें झिड़क दिया तो ऐसे में पति की खैर नहीं है। उसे न तो पत्नी बर्दाश्त करेगी और न ही बच्चे ही ज्यादा देर तक बर्दाश्त करेंगे। स्मिता ने मंदिर चलने की बात की तो नीतेन ने पैसे और पुफर्सत न होने का बहाना कर टरकाना चाहा। स्मिता का मूड खराब हो गया। उसने नीतेन को यह जतला दिया कि चैबीस घंटे तुम काम करते हो लेकिन बदले में पाते क्या हो? न तो तुम्हारे पास हमारी जरूरतों के लिए पैसे होते हैं और न टाइम ही होता है। तुम स्वयं न तो टाइम से भोजन करते हो और न सोते-जागते ही हो। गुस्से में कही गई पत्नी की बातें नीतेन को शुरू-शुरू में बुरी तो लगीं, पर अगले पल ही वह यह सोचने पर मजबूर हो गया कि बात तो स्मिता ठीक ही कह रही है। मेहनत और काम के हिसाब से जब आमदनी न हो तो आदमी को थकान व तनाव ही मिलता है और पत्नी एवं बच्चों की जरूरतें तथा शौक पूरे न होने पर उनकी नाराजगी और झिड़कियां अलग से सहनी पड़ती हैं।
यह सच है, उस काम को करके आदमी कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता, जिसका मूल्यांकन वह नहीं कर पाता है। आज अध्किांश स्त्राी-पुरुष दिन भर काम को लेकर व्यस्त रहते हैं पर उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं होता है। घर में अचानक आयी बीमारी, किसी पर्व-त्योहार या बच्चों के भविष्य पर खर्च करने के लिए आपके पास पैसे न हों तो आप चिंतन-मनन कीजिए। ऐसे मौकों पर भी जब आपके हाथ में जीरो है तो पिफर आपसे आपके बीवी-बच्चे कैसे जुड़े रह सकते हैं?आप बातों से तो उन्हें खुश कर सकते नहीं। कोई भी व्यक्ति बीवी-बच्चों की हसरतों को जानबूझ कर तो मसलना चाहता नहीं। उसके पीछे ठोस कारण होता है। हसरतें पूरी न करने का कारण या तो काम की व्यस्तता हो सकती है या ध्नाभाव हो सकता है। काम की व्यस्तता से कैसे छुट्टी मिलेगी और
ध्नाभाव से कैसे पीछा छूटेगा यह सोचना सिपर्फ पति का ही नहीं, बल्कि पत्नी का भी काम है। दोनों मिल-बैठकर बात कर सकते हैं तो अवश्य ही कोई हल निकल सकता है।
पत्नी पति की व्यस्तता और ध्नाभाव से खपफा होने की बजाए स्मिता की तरह बात करने की कोशिश करती है तो पति यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि उन्नति का आखिर सही रास्ता क्या है?सोचने से ही बात बनती है, समझाने और समझने से ही उम्मीद की लौ नजर आती है। स्मिता ने समझाया और नीतेन ने समझा। समझने की बजाए वह झगड़ पड़ता तो समस्या और बढ़ जाती। आप सदा अपनी जगह पर बीवी-बच्चों को रखकर सोचिए। घर में एक जगह पर रहकर वे उफब जाते हैं, इसीलिए वे पर्व-त्योहार या किसी पार्टी-पफंक्शन के अवसर पर आपसे जिद करते हैं, आप ऐसे मौकों पर भी असमर्थता जताते हैं तो पिफर आपकी कीमत उनकी नजरों में कोई खास नहीं रह जाती है। अपने प्रति उनकी उम्मीद को बनाए रखने के लिए मेहनत और आमदनी में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, वरना आप नकार दिये जाएंगे।

पति की जासूसी न करें सरियलों को देखकर

वृंदा ने टी.वी. आॅन किया तो कोई धरावाहिक आ रहा था। आध्े घंटे के सीरियल में उसने बस यही देखा कि एक शादीशुदा मर्द से दो कुंआरी युवतियां प्यार कर रही हैं और एक दूसरे सीन में एक शादीशुदा स्त्राी से दो युवा मर्द प्यार कर रहे हैं।
वृंदा का मूड आॅपफ हो गया। टी.वी. बंद कर वह बेडरूम से बाहर आ गई। वह एक अजीब-सी बेचैनी अपने अंदर महसूस कर रही थी। उसने आलोक का नंबर मिलाया-‘अपना ध्यान रखना…’
‘आज बड़ी हमदर्दी दिखाई जा रही है। कोई खास बात तो नहीं है?’ आलोक के इतना पूछते ही एक महिला सहकर्मी खिल-खिलाकर हंस दी। वृंदा ने हड़बड़ाए स्वर में कहा-‘यह किस महिला के हंसने की आवाज है…?’
‘इतना बड़ा आॅपिफस है। यहां महिलाओं की कमी तो है नहीं…लेकिन तुम इतनी इंक्वारी क्यों कर रही हो…?’ आलोक ने थोड़ी सख्त आवाज में कहा तो वृंदा ने ध्ीमी आवाज में यह कहकर पफोन रख दिया कि घर पर अकेली हूं न…घर जल्दी आ जाना।
घबराहट में वृंदा पति के प्रश्न का जवाब नहीं दे सकी और यह कहकर पफोन बंद कर दिया कि वह घर पर अकेली है। जल्दी आ जाना। जबकि उसके मन में कुछ और ही खिचड़ी पक रही है। आलोक जहां सर्विस करता है, वहां महिलाएं भी काम करती हैं। आलोक की किसी-न-किसी महिला से दोस्ती और पिफर प्यार हो सकता है। घर में सब कुछ है। आलोक उसका पूरा ध्यान रखता है, पिफर भी वृंदा का मन अशांत है। यह अशांति उसे टीवी के सीरियलों ने दी है।
ऐसे में आपको यह सोचने की जरूरत है कि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। धरावाहिकों की कहानियों में जिन पात्रों को जबर्दस्ती एक साथ दो-दो औरतों या पुरुषों से प्रेम करते दिखाया जाता है, रियल लाइपफ में ऐसा संभव नहीं है। क्योंकि आपने अब तक की अपनी लाइपफ में कितने स्त्राी-पुरुष को इतना भ्रष्ट देखा है, जो जान-बूझकर दो-दो बच्चों की मांओं या पिताओं से प्यार करने के लिए लालायित हों?
किसी लालच या मजबूरी में की गई शादी या प्यार की बात हम यहां नहीं कर रहे हैं। हम तो यहां यह बताना चाह रहे हैं कि जो आप पिफल्मों में या सीरियलों में काल्पनिक बेसिर-पैर के संबंधें को देखते हैं, उनका आपकी लाइपफ से कोई वास्ता नहीं है। वृंदा सीरियलों के दृश्यों और घटनाओं को देख-देखकर ही तो पागल सी हो गई है और निर्दोष आलोक उसे सपनों में भी दोषी ही नजर आ रहा है।
घर बिगाड़न्न् धरावाहिकों की टी.वी. पर भरमार है, जिन्हें महिलाएं ही अध्कि देखती हैं और किसी भी घटना को अपने पति से जोड़कर अचानक ही तनाव में आ जाती हैं।
प्रतिभा दोपहर से तनाव में थी। कभी बेडरूम में आ रही थी, तो कभी ड्राइंग रूम में जा रही थी। उसे कहीं भी चैन नहीं मिल रहा था। तभी उसकी एक सहेली का पफोन आ गया-‘कैसी हो प्रतिभा?’
‘क्या बताउफं तुझसे… आज तो मन बहुत ही अशांत है। अच्छा किया तुमने पफोन कर लिया।’
प्रतिभा के इतना बोलने पर सहेली ने सवाल कर दिया-‘आज तुम्हारा मन अशांत क्यों है?तुम्हारे पास तो सब कुछ है।’
‘अरे यार क्या बताउफं… अभी-अभी एक सीरियल देखा, जिसमें बाॅस अपनी सेक्रेटरी के साथ ही रोमांस कर रहा है… कहीं अंकुश भी अपनी सेक्रेटरी के साथ…’ यह बोलते-बोलते प्रतिभा की आवाज पफंस गई और वह गला सापफ करने लगी।
‘इन मर्दों का कुछ नहीं भरोसा… इन्हें पिफसलते देर नहीं लगती है।’ सहेली ने प्रतिभा की बात का समर्थन कर पफोन काट दिया। प्रतिभा अब तो और भी अध्कि परेशान और दुःखी हो गई। शाम को अंकुश के घर आते ही उसने सवाल कर दिया-‘सेक्रेटरी का जाॅब लोग औरतों को ही क्यों देते हैं?’
‘मुझे नहीं मालूम…’
‘सेक्रेटरी का जाॅब पुरुष भी तो कर सकते हैं?’
‘हां, कर सकते हैं…’
‘तो पिफर तुमने सेक्रेटरी के पद पर महिला को क्यों रखा है?’
‘तो क्या हो गया?वह भी तो इंसान ही होती है। आज तुमने महिलाओं के खिलापफ मोर्चा क्यों खोल रखा है?’ अंकुश ने पत्नी को आश्चर्य से घूरते हुए पूछा।
‘मुझे डर है कि कहीं तुम मुझे छोड़कर उससे शादी न कर लो…’ प्रतिभा के इतना कहने पर अंकुश गुस्सा हो गया-‘तुमने जरूर किसी सीरियल में ऐसा होते देखा होगा। तुम्हारे दिमाग की उपज तो यह हो नहीं सकती। सीरियलों की घटनाओं को रियल लाइपफ से जोड़कर देखना बंद कर दो वर्ना एक दिन पागल हो जाओगी।’
वास्तव में आज अध्किांश महिलाओं को सीरियलों ने रोगी बना दिया है। हर चीज को शक की निगाहों से देखने की उन्हें आदत-सी पड़ गई है। पति को तो वे शक की निगाहों से हर हाल में देखती हैं और उनकी गतिविध्यिों पर सदा ही नजर टिकी रहती है। पत्नी की इस जासूसी से पति की मनःस्थिति पर गलत प्रभाव पड़ता है। जो पति गलत नहीं है और पत्नी के प्रति पूरी तरह से समर्पित है अगर ऐसे में पत्नी उसकी जासूसी करते हुए पकड़ी जाती है, तो पत्नी के प्रति उसकी आस्था कम हो जाती है।
अच्छे-बुरे का पता लगाना अलग बात है और छुप-छुप कर जासूसी करना अलग चीज है। भंडा पफूटता है तो इमेज खराब हो जाती है। शरीपफ और स्नेही हृदय का पति पिफर जिद पकड़ लेता है कि जब इसे मुझ पर विश्वास ही नहीं है तो शरापफत का जामा पहन कर घूमने से क्या पफायदा?
कहने का तात्पर्य है कि कहीं पर कोई कुछ भी घटता हो तो उसे अपने साथ जोड़कर ऐसा न सोचें कि भविष्य में आपके पति या बच्चे भी इस तरह की हरकतें कर सकते हैं या कर रहे होंगे।
यह सच है कि हमारे सामने जो भी कुछ घटता है, वह हमें प्रभावित करता है और हम न चाहकर भी उसमें स्वयं को कहीं-न-कहीं महसूस करने लगते हैं। यह स्थिति खतरनाक साबित होती है। उसका पति अपनी सहकर्मी के साथ भाग गया, मेरा पति भी ऐसा कर सकता है, यह नकारात्मक सोच है। हर आदमी की सोच, नजरिया और स्वभाव दूसरे से भिन्न होता है। आपने देखा भी होगा-एक व्यक्ति नशेड़ी है, जुआरी है, औरतों का रसिया है और दूसरा कोई भी नशा नहीं करता है, उसमें कोई भी गंदी लत नहीं है, पिफर भी वे दोनों गहरे मित्रा होते हैं। हमारे भी कई ऐसे दोस्त हैं, जो शराब पीते हैं और खूब पीते हैं, पर हम शराब को हाथ भी नहीं लगाते हैं।
हमारा कहने का मतलब है कि आॅपिफस में कोई कर्मचारी गलत है या किसी का किसी से चक्कर चल रहा है तो आपके पति भी ऐसा कर सकते हैं, यह सोचना गलत है क्योंकि उनकी सोच उनके साथ होती है, आपका प्यार उनके साथ होता है, वे ऐसा करने से पहले सौ बार सोच सकते हैं। इस तरह के शौक तो वे लोग पालते हैं, जो शुरू से ऐसे ही होते हैं। जो गलत नहीं है और यदि किसी मजबूरी वश बहक गया है तो यह स्थिति लंबे समय तक के लिए नहीं होती है। आप पति के प्रति अपना नजरिया स्पष्ट एवं सापफ रखिए।

पति को रीझाना जानती हैं आप

राकेश ने बेडरूम का     दरवाजा खोला और सोपफे पर जाकर ध्म्म से बैठ गया। आज आॅपिफस में भी खूब काम था और उसे बाहर भी जाना पड़ा था। आध्े घंटे के बाद सुचित्रा आॅपिफस से घर पहुंची तो राकेश अस्त-व्यस्त सोपफे पर बैठे-बैठे ही सो गया था। थकी तो वह भी थी। प्रिफज से पानी की एक बोतल निकाली और गिलास में पानी डालकर राकेश को जगाया-‘लो, पानी पियो। आॅपिफस से आकर तुम सोते तो कभी नहीं हो। आज कुछ ज्यादा ही काम था क्या?’ एक-दो घूंट पानी पीने के बाद राकेश ने पूछा-‘तुम कब आई?’
‘दस मिनट हो गए। मैं चाय बनाकर ला रही हूं। तब तक तुम कपड़े बदल लो।’ यह कहकर सुचित्रा किचन में चली आई। चाय चूल्हे पर रखकर सुबह के जूठे बर्तन सापफ करने लगी, पिफर बेडरूम में पोंछा लगाया। इसके बाद चाय लाकर टेबल पर रख दी-‘तुम चाय पियो, मैं तब तक कपड़े धे लेती हूं।’
‘नहीं डार्लिंग, मुझे भी कुछ करने दो। तुम जाकर खाना बनाओ और मैं कपड़े धेने जा रहा हूं। काम तो तुम भी करके आई हो।’
‘ठीक है, लेकिन मेरे कपड़े मत धेना।’
‘क्यों नहीं धेना?तुम भी तो मेरे काम करती हो?’ राकेश ने सुचित्रा को आश्चर्य से देखते हुए कहा तो वह शरमाती हुई बोली-‘मैं तुम्हारी पत्नी हूं। तुम मेरे कपड़े धेओगे तो क्या यह अच्छा लगेगा?’
‘इसमें अच्छे-बुरे की बात कहां से आ गई?न तो पत्नी छोटी होती है और न ही पति बड़ा होता है। ये सब हमारे बनाए हुए नियम हैं कि पत्नी खाना बनाएगी, बर्तन सापफ करेगी, झाड़न्न्-पोंछा लगाएगी, बच्चों की देखभाल करेगी और पति सिपर्फ ध्नोपार्जन का काम करेगा, लेकिन ये तब की बातें हैं, जब पत्नी घर में ही रहती थी।’ राकेश यह कहकर कपड़े
धेने चला गया। सुचित्रा किचन में जाकर खाना बनाने लगी। आध्े घंटे के भीतर ही राकेश ने सारे कपड़े धे दिए और तब तक सुचित्रा ने भी खाना बना लिया। समय से ही खा-पीकर वे सो गए।
सुचित्रा एक सुलझे हुए विचारों की महिला है। राकेश भी पाॅजिटिव सोच रखने वाला व्यक्ति है। राकेश आॅपिफस से घर लेट पहुंचता है तो सुचित्रा कोई कमेंट्स या टोन नहीं करती है और सुचित्रा देर से घर आती है तो राकेश कोई सवाल नहीं करता है। यह सब सुचित्रा के कारण ही संभव हो सका है। आज वह आॅपिफस से घर लेट पहुंची तो थके होने का रोना रोने की बजाए उसने  पानी के गिलास के साथ राकेश को जगाया, पिफर चाय बनाकर दी। इसके बाद किचन सापफ किया। बेडरूम में पोंछा लगाया और पिफर बड़े ही विनम्र स्वर में बोली कि मैं कपड़े धेकर आती हूं तब खाना बनेगा। वह यह भी कह सकती थी कि चलो तुम खाना बनाओ, मैं कपड़े धेने जा रही हूं। नौकरी करके तुम थके हो तो मैं भी थकी हूं, लेकिन सुचित्रा ने अध्किार भाव का प्रयोग नहीं किया क्योंकि उसे यह अच्छी तरह से पता है कि अध्किारों की बात अगर उसने कर दी तो राकेश तो काम करने से रहा, उफपर से बहस भी शुरू हो जाएगी।
जीने का यह सबसे बेहतर तरीका है, जिसका बोध् बहुत कम पति-पत्नी को ही होता है। सुचित्रा ने पति को काम के लिए एक बार भी नहीं कहा, अकेले ही सारा काम करती रही। अंत में पति को खुद-ब-खुद ही पफील हुआ कि सुचित्रा भी तो थकी है। वह घर के सारे काम करती रही तब तो खाना रात के दस बजे तक भी नहीं बन पाएगा। ऐसे तो हम दोनों ही आराम नहीं कर पाएंगे। राकेश को ऐसा सोचने पर मजबूर किया सुचित्रा की पाॅजिटिव सोचों ने और यह सच भी है, सामने वाले को कोई चीज या कोई बात महसूस करानी हो तो आप उससे  कुछ भी कहिए नहीं, बस आप जितना कर सकते हैं करते रहिए। वह अगले पल ही अपने आप से शर्मिंदा हो जाएगा। राकेश को सुचित्रा ने अपने कार्यों से इतना शर्मिंदा कर दिया कि उसे कहना ही पड़ गया कि तुम खाना बनाओ। मैं कपड़े धेने जा रहा हूं। सुचित्रा ने अपने कपड़े न धेने की बात कहकर पति के मन की पफीलिंग भी जान ली कि पति उसके कपड़े धेने के लिए तैयार है या नहीं।
ऐसे गुण एक सुपर गृहिणी में ही हो सकते है, वरना तो नौकरीशुदा पत्नियां चुप कहां रहती हैं। घर में घुसते ही वे कार्यों का बंटवारा कर देती हैं कि तुम कपड़े धेओ और मैं खाना बनाने जा रही हूं। तुम झाड़न्न्-पोंछा लगा दो, तब तक मैं किचन सापफ कर देती हूं। तुम यह कर दो, मैं वह कर देती हूं, इस तरह के शब्द पति के मन में द्वेष भाव उत्पन्न करते हैं और उसके ईगो को हवा देते हैं। पति पत्नी के ऐसे आदेशों से स्वयं को अपमानित महसूस करता है और मन में यह भाव भी भर लेता है कि नौकरी कर रही है तो घर का काम मुझसे करवाना चाहती है। पति के मन में इस तरह के भाव जब आ जाते हैं तो वह यह सोच-सोच कर अपफसोस करता है कि उसने एक नौकरीशुदा लड़की से शादी क्यों की?
पति के मन में इस तरह का प्रश्न सुपर गृहणियां उठने भी नहीं देती और अपनी व्यवहार कुशलता के दम पर पति को घर के काम करने के लिए स्वाभाविक रूप से राजी भी कर लेती हैं। कहकर जो काम आसानी से नहीं कराए जा सकते हैं, वे काम बिना कहे ही कराए जा सकते हैं। बस पत्नी में ध्ैर्य और त्याग की भावना होनी चाहिए। सुचित्रा में ध्ैर्य और त्याग दोनों का ही मिला-जुला भाव है। वह कभी भी काम के लिए पति से नहीं कहती है। अपनी शक्ति और क्षमता भर वह करती रहती है। राकेश को खुद ही पफील हो जाता है कि हाथ पर हाथ रखकर बैठने से तो अच्छा है कि वह भी एकाध् काम कर दे। इससे उसे पत्नी का साथ भी मिल जाएगा और वह सुबह जल्दी भी उठ सकेगा।
आप पति हों या पत्नी एक-दूसरे को अपने-अपने अध्किारों का अहसास न करवा कर कुछ सुचित्रा की तरह ऐसा करें कि साथी के मन में स्वाभाविक रूप से कार्यों में सहयोग देने की इच्छा प्रबल हो उठे। यह मेरा काम नहीं है, तुम्हारा है, कहना अनुचित है क्योंकि जब पति-पत्नी दोनों ही नौकरीशुदा हैं तो घर का काम सिपर्फ एक का नहीं है। पत्नी आठ बजे घर आई है तो घर के सारे कार्य निपटा कर वह खाना बनाना शुरू करेगी, तो खाते-पीते ग्यारह बज जाना ही है। पिफर सुबह उठने की जल्दी, ऐसे में पति-पत्नी की अपनी कोई भी लाइपफ नहीं रह जाती है। महानगरों में या नगरों में आजकल परिवार के नाम पर सिपर्फ पति-पत्नी और एकाध् बच्चे ही होते हैं अध्किांश पति-पत्नी नौकरी करते हैं। वे जब घर पहुंचते हैं तो किचन में जूठे बर्तन, गंदा बेडरूम और बाथरूम में सुबह के पड़े कपड़े देखकर आपस में न चाहते हुए भी झगड़ पड़ते हैं। ऐसे में पत्नी सुचित्रा की तरह समझदार होती है तो बड़ी कुशलता से ही पति को कार्यों में हाथ बंटाने के लिए स्वाभाविक रूप से राजी कर लेती है एक सुपर गृहिणी या सुपर पत्नी की पहचान भी यही है।

आप पति को कहीं अपमानित तो नहीं करतीं?

अपने भाइयों को समझा दो, वे     हमारे घर के मामलों में दखल न दें। बेटी की शादी की तो वे यह बहाना करके नहीं आए कि शादी उनकी पसंद की नहीं हो रही है।’ सुहेल चिल्ला कर बोला।
‘चिल्ला क्यों रहे हो?उन्होंने कौन-सा गलत कहा था। हमारी बेटी ने अपनी पसंद से वह भी दूसरी जाति के लड़के से शादी की… समाज में हमारी कितनी थू-थू हुई। वे उसके मामा हैं। उनकी अपनी पोजीशन
है…इमेज है। उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे नहीं आए। मन तो मेरा भी उसकी शादी में शामिल होने का नहीं था, लेकिन मां होने के नाते मन नहीं
माना…’ विमला ने भी उफंची आवाज में ही जवाब दिया।
‘लड़का भी तो लव मैरिज ही कर रहा है। अब वे उसकी शादी में रुचि क्यों ले रहे हैं? इंटरपफेयर क्यों कर रहे हैं? वे ऐसा करके यही बताना चाहते हैं न कि लड़के की उन्हें बहुत परवाह है? वे जब हमारी लड़की की शादी में नहीं आए, तो अब लड़के की शादी में भी आने की जरूरत नहीं है, उनसे पफोन पर कह दो।’ सुहेल गुस्से से थर-थर कांपते हुए बोला।
‘मैं मना नहीं करूंगी। वे मेरे सगे भाई हैं और हमारे बेटे के मामा हैं। ऐसा करने का उन्हें हक बनता है।’
‘वे तुम्हारे सगे भाई हैं, तो मैं क्या तुम्हारा सगा नहीं हूं?’ सुहेल के यह कहने पर विमला सहसा ही बोल पड़ी-‘तुम मेरे सगे नहीं, सिपर्फ पति हो…और पति से जो रिश्ता होता है, वह खून का नहीं, बल्कि भावनात्मक होता है। भावनाओं के न होने पर यह रिश्ता ठंडा पड़ जाता है…’ विमला यह कहकर दूसरे कमरे में चली गई।
बहस का कोई अंत नहीं होता है और बहस बेतुकी हो जाती है तब उसका कभी कोई अर्थ नहीं निकलता है। पति-पत्नी दिन-रात लड़ते ही रहते हैं। वजह कोई भी हो बहस होना निश्चित है। अध्किांश पत्नियां अपने भाइयों और माता-पिता को ताउम्र शुभचिंतक मानती हैं और पति, जो दिन-रात उनके साथ होता है, उसे दूर के रिश्ते का ही समझती हैं।
पति-पत्नी का रिश्ता ही ऐसा है, जो भावनाओं से भी अध्कि जरूरतों और स्वार्थ पर टिका हुआ होता है। पत्नी या पति के मन में एक हल्की-सी बारीक रेखा हरदम बनी रहती है कि यह रिश्ता मानने न मानने के उफपर निर्भर है। तभी तो मनमुटाव की हल्की-सी हवा भी इसे उड़ा ले जाती है और पति-पत्नी बरसों एक साथ रहने के बावजूद अपनी-अपनी राह पकड़ लेते हैं जैसे उनके बीच कुछ था ही नहीं। सुहेल और विमला का रिश्ता कितना पुराना है। पचीस सालों से वे पति पत्नी के रूप में एक-दूसरे के साथ हंै। इन पचीस सालों में ऐसे बहुत से क्षण आए हैं, कभी सुहेल के बीमार होने पर विमला ने उसकी सेवा की है तो कभी सुहेल ने विमला को मानसिक और शारीरिक सहयोग दिया है। लेकिन अब बच्चे बड़े हो गए हैं। उनकी अपनी पसंद हो गई है और खुद ही निर्णय लेने लगे हैं तो उनमें अनबन हो गई है। अनबन का कारण बच्चे तो हैं ही, साथ ही बच्चों के मामा भी हैं क्योंकि वे बच्चों के बीच में आ गए हैं। पत्नी भाइयों के साथ हो कर पति को बात-बात पर नीचा दिखाने लगी है। पति अलग-थलग पड़ गया है। सुहेल को इस दखलंदाजी से एतराज है, लेकिन पत्नी को कोई आपत्ति नहीं है। सुहेल के समझाने पर वह यह कहकर पति को चुप कराना चाहती है कि वे उसके खून हैं। उनसे उसका खून का रिश्ता है, जो पति से नहीं है। पति से रिश्ता तो मतलब का है। अब मतलब हल हो गया है-उसकी युवावस्था बीत गई है, बच्चे बड़े हो गए हैं। वह बच्चों के साथ अपना बाकी का जीवन गुजार सकती है। पति को उसके साथ रहना होगा, तो उसे उसके साथ-साथ उसके भाइयों को भी बर्दाश्त करना होगा।
पत्नी सब कुछ भूल सकती है, लेकिन अपने मायके को ताउम्र भूल नहीं सकती है और मायके वालों को पति के लिए कभी नाराज भी नहीं कर सकती है। पति के सामने मायके को महत्व न देने वाली कम पत्नियां ही मिलेंगी। विमला ने कैसे चुटकियों में ही वैवाहिक-रिलेशन को झुठला दिया और भावनाओं का नाम देकर एक तरपफ कर दिया। अब पति का यह देखना काम है कि वह इस रिश्ते को कैसे चलाता है।
आपका यह मानना सरासर गलत है कि पति-पत्नी का रिश्ता
खून का नहीं, भावनाओं का है। रिश्ते खून के हांे चाहे बेखून के हों, उन्हंे बांध्े तो भावनाएं ही रही होती हैं। उनके मर जाने के बाद न तो खून के रिश्ते जिंदा रह पाते हैं और न ही बेखून के ही रिश्ते ज्यादा देर तक टिक पाते हैं। अगर सही मायनों में देखा जाए तो पति-पत्नी के रिश्ते बेखून के होने के बावजूद भी अन्य रिश्तों के मुकाबले अध्कि मजबूत और टिकाउफ होते हैं क्योंकि इस रिश्ते को जिंदा रहने की कई वजहें होती हैं जबकि अन्य रिश्तों के साथ ऐसा नहीं होता है। यह सच है कि पति-पत्नी का रिश्ता प्यार और विश्वास के अलावा स्वार्थ का भी होता है। दोनों एक दूसरे को बिना किसी ठोस वजह के बहुत कम ही बर्दाश्त कर पाते हैं। पत्नी कपड़े नहीं धेएगी, खाना नहीं बनाएगी या पति कमाउफ नहीं होगा, पत्नी की जरूरतें पूरी नहीं करेगा तो ऐसे में वे एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे।
यही बात अन्य रिश्तों के साथ भी होती है। केवल समझने की बात है। जो पत्नियां इन बातों को समझती हैं, वे पति को भूलकर भी अपने आप से अलग नहीं मानती हंै और किन्हीं भी हालातों में पति का ही साथ देती हैं तथा मायके के नाम पर हर जायज-नाजायज बात पर मोहर नहीं लगाती पिफरती हैं। मायके वालों का स्वागत करना तो वे जानती हैं पर घरेलू मामलों में उनकी दखलंदाजी पसंद नहीं करती हैं। यह हक तो वे सिपर्फ अपने पति को ही देती हैं। लेकिन ऐसी पत्नियों की संख्या बहुत ही कम है। ज्यादातर पत्नियां यह कहती दिख जाती हैं कि तुम मेरे डैड की तरह नहीं हो। मेरे भइया तुमसे कहीं अध्कि समझदार और मिलनसार इंसान हैं। पति ऐसे शब्द पत्नी के मुंह से सुनकर खीझ जाता है और पत्नी के प्रति असहयोगी बन जाता है। पत्नी पिफर पति की शिकायत जिस-तिस से करती पिफरती है, यह सोचे बिना कि इसका वैवाहिक-जीवन पर क्या असर होगा। हमें आज भी याद है। हमारे एक मित्रा की पत्नी ने यह कहकर उन्हें आहत कर दिया कि मेरे भाई और पापा लड़के को पसंद कर लेंगे तब मैं बेटी का रिश्ता पक्का करूंगी। दोस्त पत्नी की इन बातों से पफट पड़ा-‘बेटी को मैंने पढ़ाया-लिखाया, उसके कैरियर निर्माण पर हजारों खर्च किए, शादी में सारा पैसा मेरा खर्च होगा और पसंद चलेगी तुम्हारे भाइयों और पापा की…?’
उम्र की ढलान में पति को नकार देना और उसकी काबलियत, पसंद और कार्य कुशलता पर शक करना तथा अपने मायके की सलाह पर चलना यह एक अच्छी पत्नी की पहचान नहीं है। ऐसी पत्नियों को तो अवसरवादी या बेवपफा ही कहा जा सकता है, क्योंकि हर दुःख-सुख में जो आपके साथ रहा या आप जिसके साथ रहीं, किन्हीं कारणोंवश उसे इतना अपमानित करना आपके पत्नी होने पर शक पैदा कर सकता है और इससे आपकी इमेज पर भी गलत प्रभाव पड़ सकता है।

पति के नजदीक आने का आसान तरीका


सुलेखा बार-बार पति से आग्रह कर रही थी कि वह उसकी सहेली के घर चले। उसका पति कमल उसकी बात को काटकर कुछ और ही कहने के लिए बेताब था, लेकिन सुलेखा उसे मौका ही नहीं दे रही थी। अंत में कमल झल्ला ही पड़ा-‘‘सुलेखा, तुम से कई बार कह चुका हूं कि मुझे तुम्हारी सहेली के घर जाना अच्छा नहीं लगता। वह सहेली तुम्हारी है। जब मिलने का मन करे, जाकर मिल आया करो। मैंने तुम्हें रोका थोड़े ही है।’’ पति की बात पर सुलेखा झल्ला कर रह गयी।
अगर आपके किसी मित्रा या रिश्तेदार को आपके पति पसंद नहीं करते हैं तो उन्हें वहां जबदस्ती मिलवाने न ले जायंे। इससे आपके पति आप पर खुश होने की बजाए नाराज ही होंगे। अच्छी जिंदगी जीने के लिए अपने स्वभाव में यह सोच पैदा कीजिए।
रीमा अपने पति के साथ एक दावत में गयी। भीड़ कापफी थी। स्त्राी-पुरुष हंस-बोल रहे थे। रीमा भी एक जगह खड़ी हंस-बोल रही थी। उसकी साड़ी का पल्ला बगल में खड़े युवक की बांहों को छू रहा था और युवक अपने दोस्तों को दिखा-दिखाकर आत्म विभोर हो रहा था। तभी रीमा के पति की नजर पत्नी पर पड़ी। वह मन-ही-मन दांत भींच कर रह गया। घर पहुंचा तो रीमा पर बरस पड़ा-‘‘तुम्हें पार्टी-पफंक्शन में उठना-बैठना भी नहीं आता। कम-से-कम अपने कपड़े सहेज कर तो उठना-बैठना सीख लो।’’
रीमा को तो इस बात की कोई खबर ही नहीं थी। पति के बताने पर उसे अपने आप पर कापफी गुस्सा आया कि वह इतनी लापरवाह कब से हो गयी।
बात सच भी है, कहीं बाहर जायें तो अपना पर्स, कोट, साड़ी का पल्ला या दुपट्टा सम्हाल कर बैठें या खड़े हों, ताकि वे दूसरों का स्पर्श न करें। ऐसा न करने पर भरी महपिफल में आपकी बेइज्जती हो सकती है।
उफषा ने पति को सूचित किए बिना ही होटल जाने का प्रोग्राम बना लिया। पति घर पर आये तो पत्नी को बन-संवरकर बैठे देख अवाक् रह गये। चाय की पफरमाइश की तो उफषा ठुनक कर बोली, ‘‘चाय होटल में ही पी लेंगे।’’
‘‘होटल!… कौन जा रहा है होटल?’’ तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया। मैंने एक पार्टी को समय दिया हुआ है। वह मेरा इंतजार कर रही होगी। चाय पिलानी हो तो पिला दो वरना मैं चलता हूं।
पत्नी को कोई भी प्रोग्राम बनाने से पहले पति से बात तो कर ही लेनी चाहिए। यदि आप पति को कहीं ले जाना चाहती हैं तो कार्यक्रम बनाने से पहले उनसे पूछ जरूर लें अन्यथा व्यर्थ का क्लेश होगा। यह बात तो छोटी है, पर पति को नजदीक लाने में बहुत कारगर सि( होगी।
वास्तव में जीवन जीने का तरीका अगर आपको नहीं मालूम तो पिफर आप अपने पति के करीब मानसिक तौर पर कतई नहीं आ सकती हैं। आप अपने पति के कार्य को समझें। अपनी रुचि प्रदर्शित करें। कार्यालय में उन्हें बार-बार पफोन न करें। पफरमाइश करते समय सोच लें कि क्या उस वस्तु की आपको सचमुच ही जरूरत है। पति इन बातों से मानसिक रूप से संतुष्ट रहेगा।
इसी प्रकार मेहमानों के प्रति भी स्वस्थ व्यवहार करना सीखें,
क्योंकि कि घर आये मेहमानों के प्रति आपकी जितनी जिम्मेदारी होती, उतनी पति की नहीं होती है। चाय से लेकर लंच तक का प्रबंध् आपको ही तो करना होता है। मेहमान चाहे आपकी पसंद के हों या नापसंद के, उनसे मुस्कराकर मिलें और पूरा ध्यान उन पर दें। यदि मेहमान आपके घर रहने के लिए आये हैं और आपको देर से सुबह उठने की आदत है तो उन्हें बता दें कि चाय का सामान कहां रखा है ताकि वे खुद चाय बना सकें। यदि आप खुद मेहमान हैं तो पिफजूल की पफरमाइश न करें और जिसके घर आप गई हैं, उनके समय का ध्यान रखें तथा घर के नियमों का पालन करें। जीवन जीने की इस शैली से खुश होकर जब मेहमान या मेजबान आपके पति के सामने आपकी प्रशंसा करेंगे तो वह पफूले नहीं समायेंगे। कोई भी पति दूसरे के मुंह से अपनी पत्नी के बारे में अच्छी बातें सुनकर पत्नी पर मंत्रामुग्ध् हो जाता है।
आप जितनी ही शिष्ट, शालीन, स्मार्ट और मृदुभाषी बनी रहेंगी पति का सामीप्य उतना ही आपको मिलेगा। शिष्टाचार से पति को अपने वश में करना बहुत आसान है। अपनी जीवन शैली में समय-समय पर पफेर बदल करते रहना जरूरी है। पति के मित्रों से भी मिलने का तौर-तरीका व्यावहारिक होना चाहिए। पति की मौजूदगी या नामौजूदगी में उसके मित्रों से सहज और शालीन व्यवहार करना ही अच्छा रहता है।
अब रीमा को ही लीजिए। वह सुशिक्षित होते हुए भी इन सब बातों को नहीं समझ पाती। उसका मानना है कि नारी स्वतंत्रा है। उसको इतनी आजादी तो मिलनी ही चाहिए कि वह पुरुष मित्रों के साथ बोल-बतिया सके। इसे आजादी नहीं, स्वच्छंदता कहा जा सकता है। नारी को या पुरुष को आजादी तो मिलनी चाहिए, लेकिन स्वच्छंदता नहीं।
शिखा का पति चाहकर भी उसको टोक नहीं पाता है। उसके मित्रा घर पर जब भी आते हैं, वह उनसे बात करते-करते लट्टू हो जाती है। वैसे शिखा के मन में कोई गलत भाव नहीं हैं, पर घर-परिवार में एक बहू का शिष्ट और सौम्य तरीका किसी से मिलने-जुलने के लिए तो होना ही चाहिए। शिखा शायद इन तौर-तरीकों से अनभिज्ञ है। पति अंदर ही अंदर कुढ़ता हुआ चुप्पी  साध्े रहता है। वह रोमा से सीध्े मुंह बात भी नहीं करता है तो पिफर आप ऐसी स्थिति आने ही क्यों दें?
पति के मित्रों का स्वागत चाय नाश्ते से करने के बाद आप स्वयं को अन्य कार्यों में व्यस्त कर लें। पति के दोस्तों से आपका व्यवहार पति की इच्छानुसार हो तो अच्छा है, लेकिन पति की किसी गलत बात को आप हरगिज न मानें। न बहुत पुराना और न अति आध्ुनिक-बस बीच का रास्ता अपनाएं, तभी पति आप पर विश्वास कर पायेगा तथा आपको इज्जत भी भरपूर मिल पायेगी।

वैवाहिक जीवन और ख्वाहिशें

राकेश सारा सामान किचन में रखकर नहाने चला गया। नंदा
किचन में गयी और एक-एक सामान खोलकर डिब्बों में भरने लगी। जब उसका ध्यान दाल और तेल की तरपफ गया तो उसका मूड अचानक ही खराब हो गया। उसने किचन से ही अपने बेटे को आवाज दी, ‘‘दीपू, पापा कहां हैं?’’
‘‘अरे, मैं बाथरूम में था। नहा रहा था। हां, बोलो क्या बात है?’’
‘‘तुम खाने-पीने के सामान में कटौती क्यों करते हो? दो किलो दाल पूरे महीने चल जायेगी?तेल भी तुम दो किलो के बदले एक किलो ही ले आये हो।’’ नंदा यह कहते-कहते आवेश में आ गयी।
‘‘देखो, गुस्सा न करो। मुझे पता है, दाल और तेल पूरे महीने के लिए कम हैं। मैंने इस बार राशन के पैसों से बच्चों की स्कूल पफीस भर दी है।’’ राकेश ने शांत भाव से कहा। नंदा का गुस्सा और भी अध्कि भड़क गया, ‘‘तो इस बार सबको भूखे मारने का इरादा है क्या?मैं पूछती हूं, तुमने ऐसी कौन-सी पफंक्शन-पार्टी की है कि तुम्हें राशन के पैसे स्कूल में देने पड़ गये?मुझसे इतने कम राशन में घर नहीं चलेगा।’’
‘‘कैसे नहीं चलेगा, तुम्हारे ही तो मायके से तुम्हारे भाई-बहन आये थे। उनको विदा करने मंे जो खर्चा हुआ, उसका ही यह असर है कि आज बजट गड़बड़ा गया है।’’
नंदा पति की इस बात पर और भी गुस्सा हो गयी, ‘‘तुम्हारे घर वाले आते हैं तो क्या खर्चा नहीं होता है?’’
‘‘देखो, बात आगे न बढ़ाओ। तुम्हारे मायके से कोई आये या मेरे घर से कोई आये आखिर खर्चा तो बढ़ ही जाता है। मेरी कमाई सीमित है। तुम मेरी पत्नी हो। इस तरह की नाजुक परिस्थितियों में कभी कभार तुम मेरा सहयोग नहीं करोगी तो कौन करेगा?राकेश ने पत्नी को शांत रहने और मदद करने की सलाह दी तो वह नाक चढ़ाते हुए बोली, ‘‘मैं क्या दाल या तेल बनकर तुम्हारी मदद करूंगी।’’
‘‘नहीं, मैंने तुम्हें जो साड़ी के पैसे दिये हैं, उन्हें घर-खर्च में लगाकर मेरी मदद करोगी। पहनने के लिए तुम्हारे पास तो साड़ियां हैं ही… अगले महीने मैं तुम्हें पैसा दे दूंगा, तुम साड़ी खरीद लेना।’’ राकेश ने पत्नी को समझाया, लेकिन नंदा तैयार नहीं हुई। वह बोली, ‘‘मैं साड़ी के पैसे तो घर खर्च में नहीं लगाउफंगी। यह तुम्हारी चिंता है कि घर कैसे चलाना है।’’
पति ने अब आगे कुछ भी कहना ठीक नहीं समझा। वह कुछ पैसे दूसरे से लेने की बात सोचकर वहां से चला गया। आज की महंगाई के दौर में मध्यम वर्गीय परिवारों में पति-पत्नी के बीच ऐसी बातों को लेकर अक्सर बहस होती ही रहती है। देखने में ऐसी बातें छोटी लगती हैं, लेकिन छोटी होती नहीं हंै। पति-पत्नी दोनों ही जब तक वैचारिक और मानसिक स्तर पर एक-दूसरे के अनुकूल नहीं होते हैं, तब तक बात बनती नहीं है। पति कमा-कमा कर बूढ़ा हो जाता है, पिफर भी वह किसी को भी खुश नहीं रख पाता है। कम कमाने वाले पतियों के पत्नियों से संबंध् अध्किांश मामलों में ध्नाभाव के कारण ही खराब हो जाते हैं। ऐसा नहीं कि वे एक-दूसरे से प्यार नहीं करते हैं, लेकिन उनके संबंधें में प्यार कम और घृणा, उपेक्षा तथा गुस्सा अध्कि होता है। पत्नी और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए समय और पैसा दोनों ही चाहिए और मध्यम वर्गीय परिवारों के अध्किांश पतियों के पास पैसा और समय दोनों का ही अभाव होता है। पत्नी जो खाना चाहती है, जो पहनना-ओढ़ना चाहती है, जिस तरह की सुख-सुविध चाहती है या बच्चों को जिस माहौल या स्कूल में पढ़ाना चाहती है, पति उसकी इन जरूरतों को या उसकी इन ख्वाहिशों को पूरा नहीं कर पाता है तो वह स्वाभाविक रूप से पत्नी की उपेक्षा और घृणा का शिकार हो जाता है। पति मजबूर होता है, लाचार होता है और अपनी सपफाई में कुछ कह भी नहीं पाता है, क्योंकि आय को जरूरतों के अनुसार बढ़ाना इतना आसान नहीं होता है।
अब राकेश की पत्नी को ही लीजिए। घर पर मेहमानों के आने के कारण बजट गड़बड़ा गया। राकेश ने घर खर्च के लिए रखे पैसों में से कुछ पैसे बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर दिये और राशन कम लाकर दिया तो पत्नी उस पर भड़क उठी। भोजन के साथ-साथ पढ़ाई भी तो बच्चों के लिए आवश्यक है। स्कूल पफीस समय से जमा न होने पर बच्चों के नाम स्कूल से कट जाते, बच्चे महीने भर घर बैठे रहते तो क्या पत्नी को यह अच्छा लगता? पत्नी ने साड़ी खरीदने के लिए पैसे रखे हैं, लेकिन वह उन पैसों को घरेलू कार्यों पर खर्च करने के लिए तैयार नहीं है।
पति किसी से उधर पैसे लेकर घर चलाये या चोरी करके घरेलू जरूरतों को पूरा करे, यह उसकी टेंशन है। ऐसा सोचना बिलकुल ही गलत है। अगर पति भी ऐसा सोचता है तो वह गलत है। घर, बच्चे और अचानक आने वाले मेहमान पति-पत्नी दोनों के ही होते हैं। मेहमान पति का हो या पत्नी का हो या पिफर किसी दूर के रिश्ते का हो, उसकी आवभगत की जिम्मेदारी तो दोनों की ही होती है। मेहमानों के आने से, किसी के अचानक बीमार पड़ने से, किसी विवाह, पार्टी या पर्व-उत्सव की वजह से घर में पैसे की कमी हो जाती है तो ऐसे नाजुक हालातों का सामना यदि पति-पत्नी दोनों ही मिलकर करते हैं तो पहाड़-सी दिखने वाली समस्या बहुत ही हल्की एवं छोटी हो जाती है। पत्नी का ऐसा सोचना कि उसने अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए कुछ पैसे बचाकर रखे हैं पति मरे या जीये या तनाव में रहे, लेकिन किसी भी हाल में देना ही नहीं है बिलकुल ही गलत है और इस तरह की सोच को ही नकारात्मक सोच कहा जाता है। पति-पत्नी के बीच कुछ भी व्यक्तिगत नहीं होता है और उस समय तो बिलकुल ही नहीं जब घर के आर्थिक हालात नाजुक होते हैं। ऐसे हालातों में ही पति-पत्नी के संबंधें के बिगड़ने का खतरा सबसे अध्कि होता है। एक-दूसरे के प्रति थोड़ी-सी भी वैचारिक भिन्नता या उपेक्षा वर्षों के त्याग और प्यार को मटियामेट कर सकती है, लेकिन उच्च वर्गीय परिवारों में पति-पत्नी के संबंधें में मन-मुटाव आने की वजह मध्यम वर्गीय परिवारों से बिलकुल ही अलग होती है।
वहां खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने और आम जरूरतों के लिए पैसे की कोई कमी नहीं रहती है। ध्नाढ्य परिवारों में वैचारिक भिन्नता, अध्किारों और स्वच्छंदता आदि को लेकर पति-पत्नी के बीच बहसें अक्सर ही होती रहती हैं, जो एक दिन तलाक तक पहुंच जाती हैं।
डाली का पति बिजनेस के काम से शहर से बाहर था। इसी दौरान उसकी सहेली अपने पति के साथ उसके घर आयी और डाली पति से पूछे बिना ही शहर से बाहर चली गई। दो दिन के बाद डाली का पति घर आया तो उसने अपनी मां से डाली के बारे में पूछा। मां ने बताया कि वह तो अपनी एक सहेली के साथ हरिद्वार गयी है, लेकिन तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो, वह तो तुमसे पफोन पर बता कर गयी होगी।
डाली का पति चुपचाप अपने कमरे में चला गया। डाली ने तो इस बारे में उससे कुछ पूछा ही नहीं था। डाली जब दो दिन के बाद लौटकर घर आयी तो पति उस पर नाराज होते हुए बोला, ‘‘तुम किससे पूछकर अकेली दो दिन घर से बाहर रही?’’
‘‘इसमें किसी से पूछने की क्या जरूरत है। क्या मुझे इतनी भी आजादी नहीं कि मैं कहीं आ-जा सकूं?’’ डाली गुस्सा होकर बोली।
‘‘आजादी तो तुम्हें पूरी मिली हुई है। तुमने यह जो काम किया है, उसे आजादी नहीं स्वच्छंदता कहते हैं। तुमने न तो घर पर किसी से पूछा, न मुझसे ही पफोन पर बात की और चुपचाप घर से निकल गयी। यदि तुम्हें इस तरह की आजादी चाहिए तो मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना।’’
डाली का चेहरा पल भर में ही उतर गया। वह गुस्से से भिनभिनाती हुई दूसरे कमरे में चली गयी।
बस यही तो होता हैं। जहां आम जरूरतों को लेकर समस्या नहीं
होती है, वहां पति-पत्नी के बीच अध्किारों, विचारों, पसंद, नापसंद
को लेकर झगड़े होने लगते हैं, जो संबंधें को समय-समय पर चोट पहुंचाते रहते हैं।

दुर्गध कहीं संबंध न बिगाड़ दे


आज पिफर आपने दाढ़ी नहीं बनायी?’ मानसी ने अपने पति को टोक दिया, जो उसको अपनी बांहों में लेने के लिए उसकी तरपफ ही बढ़ता चला आ रहा था। पति ने दाढ़ी पर हाथ पफेरते हुए कहा, ‘‘क्या पफर्क पड़ता है। दाढ़ी आज नहीं बनी तो कल बन जायेगी।’’
‘‘पफर्क पड़ता है। दाढ़ी तुम पर अच्छी नहीं लगती है। इससे मुझे भी असुविध होती है।’’ मानसी ने दोबारा यही बात कही तो पति नाराज हो गया, ‘‘जब तुम्हें मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी से असुविध होती है तो दूसरा पति चुन लो। थोड़ी-सी दाढ़ी क्या बढ़ गयी, तमाशा खड़ा कर दिया। मैं नहीं बनाता दाढ़ी। मेरे साथ रहना है तो रहो, नहीं तो यहां से जाओ।’’
मानसी नाराज होकर दूसरे कमरे में चली गई। दोनों का अच्छा-खासा मूड एक छोटी-सी बात को लेकर खराब हो गया, लेकिन यह बात इतनी छोटी भी नहीं है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातें प्यार को कम करती हैं। दाढ़ी आप बनाते ही नहीं हैं। पूरी तरह से छोड़ रखा है, यह तो अलग बात है, लेकिन आप दाढ़ी रोजाना बनाते हैं और आलस्य या लापरवाही वश उसे बीच-बीच में यूं ही छोड़ देते हैं, तो इसका आपके व्यक्तित्व पर गलत प्रभाव पड़ता है। अध्बढ़ी दाढ़ी पत्नी को चुभती है और वह भी ऐसे क्षणों में चुभती है जब पति-पत्नी दोनों ही सहवास क्रीड़ा में संलग्न होते हैं। ऐसे कोमल क्षणों में पति की दाढ़ी का पत्नी के गले या गालों पर चुभना पत्नी के लिए ठीक नहीं होता है। अकारण ही उसका सारा ध्यान इस चुभन की ओर चला जाता है और पत्नी प्यार की गहराइयों में पूरी तरह से डूब नहीं पाती है। पति के गाल पर बढ़ी दाढ़ी का बुरा प्रभाव पत्नी के मन पर भी पड़ता है। सेक्स का संबंध् मन और आंखों से ही होता है। आंखें जो चीज पसंद करती हैं, मन भी उसे ही पसंद करता है और यदि पति बढ़ी दाढ़ी में पत्नी को अच्छा नहीं लगता है तो वह मानसिक रूप से सहवास के लिए तैयार भी नहीं हो पाती है। इन हालातों में जो यौन-संबंध् बनते हैं, उनमें पत्नी का पूरा सहयोग पति को नहीं मिल पाता है। आप काम की व्यस्तता या लापरवाही के कारण दाढ़ी नहीं बना सके हैं तो पत्नी के टोकने पर बड़े ही प्यार से कहें कि आज याद न रहा। आगे से ध्यान रखूंगा। इस तरह के जवाब से बात आगे नहीं बढ़ती है और बढ़ी दाढ़ी में भी बात बन जाती है। पति-पत्नी का रिश्ता तो प्यार का है, कोई भी बात प्यार से ही सुलझायी जा सकती है। इसे में नहीं करूंगा। क्या कर लोगी या तुम्हें जो करना हो कर लो, नहीं चलता है।
बत्ती बंद कर अर्चना पलंग पर आयी और पति के होंठों पर अपना हांेठ रख दिया। अगले ही पल पति ने अपना मुंह दूसरी तरपफ पफेर लिया। अर्चना को बहुत ही बुरा लगा। वह झनकती हुई बोली, ‘‘मैं प्यार कर रही हूं और जनाब नखरे दिखा रहे हैं।’’
पति नाक सिकोड़ते हुए बोला, ‘‘मैं दो-तीन दिनों से ऐसा महसूस कर रहा हूं, तुम्हारे मंुह से अजीब-सी बदबू आती है। तुम या तो मुंह ठीक से सापफ नहीं करती हो या कोई ऐसी चीज खाती हो, जिससे तुम्हारे मुंह से बदबू आती है।’’
पत्नी का मूड बिगड़ गया। वह चीखने लगी, ‘‘लगता है तुम्हारा मुझसे दिल भर गया है, तभी तो ऐसी बेतुकी बातें कर रहे हो। मेरे मुंह से बदबू आ रही है तो क्या तुम्हारे मुंह से खुशबू आ रही है?मुझे नहीं तुम्हारे साथ सोना, मैं दूसरे कमरे में जा रही हूं।’’ यह कहकर अर्चना उठी और चली गयी।
रात का पूरा माहौल पल भर में ही खराब हो गया। सहवास में चंुबन का विशेष महत्व है। इसके बिना सहवास का आनंद नहीं लिया जा सकता है। पत्नी के मुंह से बदबू आये या पिफर पति के पसीने से बदबू आये, ये दोनों ही चीजें सेक्स को कम करती हैं और जीवन साथी के प्रति अरुचि का कारण बन जाती हैं। जीवन साथी के प्रति अरुचि का पैदा हो जाना, कोई छोटी बात नहीं है और इन छोटी-छोटी बातों से ही ऐसे हालात पैदा होते हैं। इन्हें आप यौन-संबंधें के बीच आने ही न दीजिए। लहसुन, प्याज, शराब, सिगरेट, पान-मसाला, तम्बाकू ऐसी चीजें हैं, जिनकी बदबू देर तक मुंह में बनी रहती है और पति या पत्नी को एक दूसरे के नजदीक आने से रोकती हैं। पति या पत्नी के रोकने पर बदबू आने के कारणों का पता लगायें और गुस्सा करने की बजाए उसे दूर करने का उपाय करें। इस तरह से अलग बिस्तर पर चले जाना समस्या का कोई ठोस समाधन थोड़े ही हो सकता है। शिकायत जायज हो तो उसे मानने में ही आपकी बु(िमानी है। गुस्सा करने से तो पूरा वैवाहिक-जीवन ही खतरे में पड़ सकता है।
सोहन की नयी-नयी शादी हुई थी। वह जब भी रात के एकांत क्षणों में पत्नी के करीब आने की कोशिश करता, पत्नी अजीब सी घबराहट महसूस करने लगती और उससे निवेदन भरे स्वर में कहती कि मुझे चुंबन मत कीजिए। मैं पसंद नहीं करती।
एक रात सोहन पत्नी के मना करने पर अड़ गया, ‘‘क्यों, तुम्हें मेरा चूमना पसंद नहीं है? यह क्रिया तो सेक्स में अपना विशेष स्थान
रखती है।’’
‘‘हां, मैं जानती हूं।’’ पत्नी ने दबे स्वर में कहा।
‘‘तुम जानती हो, पिफर भी मुझे चुंबन लेने से मना करती हो?ठीक है, मैं आज से तुम्हारे पास नहीं आउफंगा। तुम्हें मेरा चुंबन इतना ही बुरा लगता है तो पिफर ये सब करने की जरूरत ही क्या है।’’
सोहन यह कहकर जाने लगा तो पत्नी ने उसकी बांह थाम ली और बड़ी ही मुश्किल से बोली, ‘‘देखो, मेरी बात का बुरा मत मानना। तुम तम्बाकू खाना छोड़ दो।’’
‘‘मैं तम्बाकू खाना क्यों छोड़ दूं?तुम पागल तो नहीं हो गयी हो?’’
‘‘पागल तो आप हो गये हंै, तम्बाकू आप खाते हैं और बिना कुल्ला किये ही सो जाते हैं। आपके मुंह से तम्बाकू की जो बदबू सांसों के साथ आती है, वह मेरा मन खराब कर देती है। पिफर मुझे आपके होंठों से होंठ लगाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती है।’’
पत्नी ने बड़े ही सलीके से सौम्य भाषा में अपनी पूरी बात कह दी। सोहन एक समझदार व्यक्ति था। उसे पत्नी की बात बुरी नहीं लगी। वह कमरे से निकलकर सीध्े वाॅश बेसिन के पास पहुंचा और ब्रश से दांतों को सापफ करके कुल्ला किया, पिफर कमरे में आकर बोला, ‘‘अब तो तुम्हारी शिकायत दूर हो गयी होगी?’’
पत्नी ने मुस्करा कर उसे बांहों में भर लिया-‘‘तुम दुनिया के सबसे अच्छे पति हो।’’
दुनिया का सबसे अच्छा पति बनने के लिए आपको इन सारी गंदी लतों को छोड़ना पड़ेगा। यही बात पत्नी पर भी लागू होती है। गंदी आदतें यौन-जीवन एवं वैवाहिक-जीवन दोनों को ही बिगाड़ती हैं और पति-पत्नी को एक-दूसरे से दूर ले जाती हैं। मुंह से बदबू आना, पसीने से बदबू आना, कोई नशा करने के बाद कुल्ला या ब्रश किये बिना ही सहवासरत हो जाना यौनानंद को कम करता है। जो पति-पत्नी समझदार होते हैं, वहां इस तरह की समस्याएं हल होते देर नहीं लगती है और जो पति-पत्नी समझदार नहीं होते हैं, वहां इस तरह की समस्याएं संबंध्-विच्छेद तक का भी कारण बन जाती हैं। अगर इस तरह की समस्या हो तो अपने जीवन साथी से सलीके से शिकायत कीजिए ताकि उसे अपनी बेइज्जती महसूस न हो और बात भी बन जाये।

मैरिज लाइफ का ग्लैमर खुलापन और आजादी

इस डिब्बे में क्या है?’ आॅपिफस से आए पति से शुचिता ने पूछा। पति डिब्बे से साड़ी निकाल कर बोला-‘साड़ी है। तुम्हारे पास साड़ियां गिनी चुनी ही थीं, इसीलिए लेता आया। तुम्हें तो पसंद है न?’
‘तुम कभी मेरे लिए कोई चीज खराब लाते हो जो यह खराब
होगी। जब से मेरा विवाह हुआ है, मैं कपड़ों के मामले में तुम पर ही तो निर्भर हूं।’
शुचिता ने यह कहकर पति को प्यार से गले लगा लिया।
रात अच्छी गुजरी। सुबह बाथरूम में घुसते हुए पति चिल्लाया-‘तौलिया दे दो।’
‘बाथरूम में तुम्हारी जरूरत के सारे सामान मैंने पहले से ही रख दिए हैं।’
शुचिता किचन से ही बोल कर चुप हो गई। पति नहाकर बेडरूम में आया तो शुचिता ने गोभी पनीर के परांठे खाने की मेज पर रख दिए। पति खाने लगा।
शुचिता ने पूछा-‘परांठे स्वादिष्ट बने हैं?’
‘तुम्हारे हाथ का कोई भी खाना कभी खराब बनता है। बहुत
बढ़िया… मुझे परांठे बहुत पसंद आए।’
‘सच बोल रहे हो?’
‘क्या भोजन के मामले में शादी से पहले मैं मां पर निर्भर था और अब तुम पर निर्भर हूं।’ पति ने बड़ी ही सहजता से कहा।
शुचिता हंसने लगी-‘अच्छी बात है। तुम्हें भोजन मेरी पसंद का अच्छा लगता है और मुझे परिधन तुम्हारी पसंद के अच्छे लगते हैं…’
‘इसमें बुरा भी क्या है। हम इसी बहाने एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते तो हैं।’
‘अच्छा, मुझे याद आया… मेरी एक सहेली के यहां जन्मदिन की पार्टी है। तुम तो देर से आओगे। मैं विमला आंटी को चाबी देकर चली जाउफंगी।’
‘ठीक है।’
‘तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा न?’
‘बुरा क्यों लगेगा। इतनी आजादी तो तुम्हें मिलनी ही चाहिए। आखिर तुम पत्नी हो कोई गुलाम तो नहीं।’
‘मुझे आने में देर हो जाए तो…?’
‘कोई बात नहीं। इतना तो चलता ही है। वैसे भी पार्टी-पफंक्शन से आने में देर हो ही जाती है। मैं भी तो कहीं जाता हूं तो देर हो जाती है। जब तुम बुरा नहीं मानती, तो मैं क्यों बुरा मानूंगा…’ पति यह कहकर आॅपिफस चला गया।
पति-पत्नी के रिलेशन इतने सापफ-सुथरे और खुले हुए होने चाहिए। जहां इस तरह की सोच वाले पति-पत्नी होते हैं, वहां पिफजूल की बहसबाजी, तनाव या झगड़े पैदा नहीं होते हैं तथा हमेशा शांत माहौल बना रहता है। पति-पत्नी के रिश्ते पर जब पुरुषवादी सोच हावी हो जाती है तब पत्नी घुट-घुट कर जीने लगती है।
तुम किसी से बात नहीं करोगी। जहां भी जाओगी मेरे साथ जाओगी। तुम्हारा हंसना-बोलना सिपर्फ मेरे साथ होगा। आॅपिफस से जल्दी घर आ जाना आदि हिदायतें अध्किांश पति पत्नियांे को देते हैं। पत्नियां भी इस मामले में आज पीछे नहीं हैं-छः बजे आॅपिफस बंद होता है तो साढ़े छः बजे तक घर आ जाओगे इत्यादि हिदायतें पत्नियां भी पति को देती हैं।
इन हिदायतों से क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि आज पति-पत्नी एक-दूसरे से कितना डरे हुए हैं। उन्हें वैवाहिक जीवन को लेकर कितनी चिंता है कि न जाने कब पति या पत्नी छिटक कर कहीं दूर हो जाए।
ऐसी सोच तभी पैदा होती है जब वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होते हैं। किसी का किसी से मतलब नहीं होता है। पसंद-नापसंद आपस में नहीं मिलती है या पिफर वे एक-दूसरे के साथ स्वयं को सुविधजनक स्थिति में नहीं पाते हैं। निर्भरता वैवाहिक जीवन की जान होती है। शुचिता के लिए पति कोई भी चीज लाता है तो वह कोई आलोचना या समालोचना न कर सहर्ष ही स्वीकार कर लेती है। पति भी आंखें बंद कर शुचिता की कोई भी बात मान लेता है। उन्हें एक-दूसरे पर पूरा भरोसा है और यह भरोसा एक या दो दिन में पैदा नहीं होता है, इसके लिए पति-पत्नी को सालों मेहनत करनी होती है। अपने जीवनसाथी को विश्वास दिलाना होता है कि हम एक-दूजे के लिए बने हैं। हमारे रिश्ते में छल-कपट नहीं चलेगा। शुचिता को पार्टी में अकेले जाने की इजाजत पति ने यही सोचकर दी कि शुचिता को रिश्तों की अहमियत का ज्ञान है।
पार्वती अपने पति के साथ स्वयं को बिलकुल ही सहज महसूस करती है, क्योंकि पति पार्वती के गुणों को देखकर पफूल की तरह खिल उठता है और अवगुणों पर कोई ध्यान न देकर सिपर्फ उसे जतला देता है कि यह पार्वती के लिए ठीक नहीं है।
सहजता वहीं पर पैदा होती है, जहां पर एक-दूसरे को ‘प्वाइंट आउट’ करने की परंपरा नहीं होती है। आदमी असहज स्वयं को वहीं महसूस करता है, जहां भरी महपिफल में भी पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। लोगों के बीच पति या पत्नी को जलील एवं लज्जित करना मूर्खता है, इससे लज्जित करने वाले और लज्जित होने वाले दोनों की ही छवि खराब होती है और कुछ भी हाथ नहीं लगता है। एक-दूसरे के साथ स्वयं को सुविधजनक स्थिति में महसूस करना भी पति-पत्नी के लिए आवश्यक है। ऐसे हालात आजादी से पैदा होते हैं। शुचिता ने पति से जब यह कहा कि वह एक पार्टी में जाना चाहती है और आने में देर होने पर वह नाराज तो नहीं होगा पति ने सहजता से उसे अनुमति दे दी। आजकल ऐसे पति बहुत ही कम हैं। उनकी तरपफ से पत्नी को थोड़ी-सी भी आजादी नहीं मिली हुई है। जब कामकाजी पत्नी को जल्दी घर आने की सलाह दी जाती है तो भला पत्नी को अकेले किसी पार्टी-पफंक्शन में कैसे भेजा जा सकता है और भेजा भी जा सकता है तो घर देर से लौटने की बात कबूल नहीं की जा सकती है। इतनी आजादी तो पत्नी को मिलनी ही चाहिए कि वह भी एक सामाजिक प्राणी के रूप में सांस ले सके। दिन-रात घर के कार्यों में लगे रहना और पफुर्सत के क्षणों में घर में बैठकर मक्खी मारते रहना एक स्त्राी के स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है। वह ऐसे में मानसिक रोगी हो सकती है। उदासीनता से घिर सकती है। जीवन से निराश हो सकती है। पति के प्रति कठोर हो सकती है। पत्नी को उचित आजादी और खुलापन देकर उसे सहज बनाए रखिए।

पत्नी अपमानित कब महसूस करती है

अर्पिता रात के ग्यारह बजे घर आई। घर के अधिकांश लोग सो गए थे। दबे पांव वह बेडरूम में दाखिल हुई। अभिनव दोनों बच्चों के बीच में उफंघ रहा था। किसी को डिस्टर्ब न हो यह सोचकर अर्पिता ने कपड़े भी नहीं बदले और वह दूसरे बेड पर चुपचाप जाकर लेट गई।
सुबह आंख खुली तो देखा, अभिनव आॅपिफस के लिए जा चुका है। उसने सोचा-‘जल्दी होगी, इसीलिए मुझे जगाना उचित नहीं समझा होगा।’
आज उससे सास, ननद ने भी कोई खास बात नहीं की। आखिरकार अर्पिता को ही मुंह खोलना पड़ा-‘मांजी, अभिनव मुझसे मिले बिना ही चले गए।’
‘क्यों, तुमसे बताकर नहीं गया है?तुम पता नहीं रात में कब आई। वह तो आॅपिफस से जल्दी आ जाता है। सुबह-सुबह तुम्हारी नींद में बाधा उत्पन्न करना ठीक नहीं समझा होगा।’
सास यह कहकर अपने काम में लग गई। अर्पिता को सही जवाब न मिलने पर कुछ चिंता-सी हुई। वह भी तैयार होकर आॅपिफस के लिए निकल गई। वहां पहुंचते ही उसने पफोन किया। अभिनव पफोन पर उसे नहीं मिला। एक महिला सहकर्मी ने रिसीवर उठाया-‘हलो।’
‘मिस्टर अभिनव से बात करनी हैं।’
‘उनके मोबाइल पर संपर्क कीजिए। वह आज आॅपिफस से बाहर हैं।’
अर्पिता के मन में शक के बीज का रोपण हो गया-‘वह महिला तो दिन भर अभिनव के साथ रहती होगी। अभिनव तभी तो मेरी कोई परवाह नहीं करता। मुझसे कोई सवाल-जवाब नहीं करता…’
इतनी-सी छोटी बात पर अर्पिता के मन में शक का बीजारोपण हो गया। अर्पिता घर देर से क्यों पहुंचती है, वह अब अभिनव से अपने लिए इस सवाल की आशा करने लगी है। कभी-कभी सवाल-जवाब न करने पर भी पति-पत्नी में से कोई एक शक के घेरे में आ जाता है। अर्पिता घर देर से आती है। अभिनव कोई सवाल नहीं करता है। उस पर उंगली भी नहीं उठाता है। उसका इंतजार भी नहीं करता है। शुरू-शुरू में तो अर्पिता को अभिनव का यह बर्ताव बढ़िया लगा कि चलो पति समझदार है। आॅपिफस से लेट-सेट आने पर कोई प्रश्न नहीं करता है। गाली-गलौज नहीं करता है, लेकिन आज जब उसके साथ महिला सहकर्मी के होने का अहसास हुआ, तो वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगी। पति उसे देर से आने पर टोके, कोई सवाल करे, ऐसी इच्छा मन में प्रबल हो उठी। अर्पिता में अचानक यह बदलाव कैसे और क्यों आया?महिला सहकर्मी अभिनव के साथ है, इस बात का पता चलते ही अर्पिता ने निगेटिव सोच पाल ली कि मौज-मस्ती करने के लिए एक महिला मित्रा है, तो वह उसकी परवाह क्यों करेगा?
अर्पिता ने अब उसके मोबाइल का नंबर मिलाया। उध्र से आवाज सास की आई तो उसने पफोन काट दिया-‘अभिनव ने तो मोबाइल घर पर ही छोड़ रखा है।’
आॅपिफस में सारा दिन वह डिस्टर्ब ही रही। काम कोई खास नहीं किया। जो मीटिंग थी, उसे भी कैंसिल कर दिया और अभिनव से पहले ही घर पहुंच गई। सास ने जल्दी आने का कारण पूछा, तो वह झल्ला गई-‘क्या मैं घर जल्दी नहीं आ सकती?’ कहकर वह सीध्े बेडरूम में चली गई। बच्चे दौड़ते हुए उसके पास आए, तो उन्हें दो-दो टाॅपिफयां देकर बहला दिया और कहा-‘दादी के पास जाओ। आज मम्मा की तबीयत ठीक नहीं है।’
रात के दस बजे अभिनव आया, तो मां ने उसे टोकते हुए कहा-‘आ गया बेटा, आज बहू न जाने क्यों परेशान है। वक्त से पहले ही आ गई है।’
अभिनव बेडरूम में जैसे ही दाखिल हुआ, अर्पिता ने सवाल कर दिया-‘तुम्हें तो मेरी कोई चिंता ही नहीं है।’
‘ऐसा क्यों कह रही हो? मुझे तो तुम्हारी चिंता बराबर रहती है।’
‘झूठे कहीं के… तुम कैसे पति हो, मैं रात के ग्यारह बजे आउफं या बारह बजे आउफं तुमने कभी मुझे टोका है कि यह कोई घर आने का टाइम है?मैं जब भी आती हूं तुम सोए हुए मिलते हो और सुबह जाग गई तो ‘हाय-हलो’ कर लिया, नहीं तो यूं ही निकल गए।’
‘तुम दुनिया की पहली बीवी हो, जो यह कह रही है कि मैं घर देर से आउफं तो सवाल-जवाब करो। मुझ पर उंगली उठाओ। तो चलो
बताओ, किससे इश्क लड़ाकर घर देर से पहुंचती हो?’ अभिनव के यह कहते ही अर्पिता तकिए से उसे मारने लगी-‘मजाक छोड़ो, मैं इस
मामले में सीरियस हूं। किसी के भी घर देर से पहुंचने पर कोई पूछता है कि देर क्यों हो गई। टाइम से घर आ जाया करो, तो अपनेपन का
अहसास होता है। तुम अपनत्व भरे शब्द कहां से बोलोगे, मेरा इंतजार भी नहीं करते हो…’
‘तुम्हारे जाॅब को मैं जानता हूं। उसमें देर-सवेर होना ही है, इसीलिए कोई सवाल नहीं करता कि तुम बुरा न मान जाओ। चलो आज से तुम्हारी वेट भी करूंगा और तुम्हें देर से आने पर टोकूंगा भी…’
अर्पिता पति के करीब आती हुई बोली-‘एक-दूसरे से सवाल करने का हक दोनों को ही है। इससे लगता है कि हम एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते हैं। मुझे यह अहसास तुमसे चाहिए…’ अभिनव ने अर्पिता का माथा चूम लिया।
वास्तव में ही यह अध्किार तो पति-पत्नी दोनों को ही मिलना चाहिए। टोकने, पूछने, इंतजार करने से लगता है कि कोई तो है अपना, जो घर पर मेरा इंतजार कर रहा होगा। ऐसी अनुभूति नहीं होने पर पति पत्नी से और पत्नी पति से दूर होती चली जाती है। अर्पिता को जब पति का अपनत्व तथा प्यार मिलना बंद हो गया। पति ने उसके आने-जाने की चिंता करनी छोड़ दी, तो वह स्वयं को अपमानित, उपेक्षित और घर में पफालतू समझने लगी। उसे यह लगने लगा कि अभिनव बाहर से ही संतुष्ट होकर आता है, तो वह उसके होने या न होने की चिंता क्यों करेगा। पत्नी अपने पति से प्यार ही नहीं, एक सीमित मात्रा में प्रतिबंध् भी चाहती है और पति भी यही सब कुछ चाहता है।
लेकिन आज की महिलाएं तो रोक-टोक को अपनी आजादी और उन्नति के रास्ते का रोड़ा समझती हैं। उनका यह सोचना गलत है, क्योंकि जायज और सीमित मात्रा में वही पति पत्नी से सवाल करते हैं, जो उसे चाहते हैं और उसकी चिंता करते हैं। यह प्यार का एक दूसरा रूप है, जिसे स्वस्थ एवं सुखद वैवाहिक-जीवन के लिए समझना आवश्यक है।