गुड सेक्स रिलेशन के लिए चेंजिंग

आज जल्दी घर आ गए हो, तो चलो जरा बाहर ही टहल आते हैं।’ लता ने अवि के कंध्े पर बड़े ही याराना अंदाज में हाथ रखकर कहा, तो अवि की दिनभर की थकान मिट गई। लता ने पिफर अपनी बात दोहराई-‘क्या इरादा है?’
‘अब तुम इतनी मोहक अदा से कह रही हो, तो बंदा मना कैसे कर सकता है। सिपर्फ टहलने का ही इरादा है या और कुछ…?’
लता हंस पड़ी-‘इतने बु(ू तो तुम हो नहीं… टहलने जाएंगे, तो घर आकर खाना तो बनेगा नहीं।’
‘तो फटापफट तैयार हो जाओ। आज तुम्हें एक ऐसे रेस्टोरेंट में ले चलूंगा कि वहां का खाना खाकर तुम और भी अध्कि मुझसे प्यार करने लगोगी।’
वे दोनों रेस्टोरंेट से रात के नौ बजे घर लौटे। लता बेडरूम में आकर कपड़े चेंज करने लगी। तभी अवि पीछे से उसे बांहों में लेते हुए बोला-‘क्या इरादा है?’
‘इरादा नेक है, लेकिन मुझे तो नींद आ रही है। क्या कोई ऐसा उपाय है, जो नींद को दूर कर दे?’ लता यह कहकर अपनी पीठअवि की छाती पर रगड़ने लगी।
‘खुजली हो रही है क्या?’ अवि ने यह कहते हुए उसकी पीठपर उंगलियां रख दीं, पिफर आहिस्ता-आहिस्ता उंगलियां पीठपर पिफराने लगा। लता की नींद अब ध्ीरे-ध्ीरे गायब होती जा रही थी।
वह अचानक ही मुड़कर अवि की छाती से चिपक गई-‘आखिर तुमने नींद तोड़ ही दी। आज पहली बार तुमने ऐसा किया है। अब तक मुझे इस आनंद से तुमने वंचित क्यों रखा?’
‘बु(ू, मुझे भी इसके बारे में कहां पता था। यह जो तुमने अपनी पीठमेरी छाती में रगड़ी तो मुझे लगा कि मेरे हाथों का स्पर्श भी तुम्हें अच्छा लगा। यह तो इत्तेपफाक है।’ कहकर अवि ने लता को गोद में उठा लिया और पलंग की ओर बढ़ गया।
सेक्स समय मांगता है, प्यार मांगता है, मनुहार मांगता है और दर्द से राहत पाने के लिए साथ मांगता है। पत्नी के पास आना और सहवास रत हो जाना तथा पत्नी के पास आना और उसे सुनना-समझना ये दोनों ही बातें अलग-अलग हैं। दुनिया के सभी पति-पत्नी सेक्स जीवन को जीते हैं, लेकिन कितने जोड़े सुखद यौन-जीवन को जी रहे हैं या जीते हैं, सोचने वाली बात यह है। अब लता और अवि को ही लीजिए। अवि आॅपिफस से जल्दी घर आ गया, तो लता ने अपने मन की बात कह दी-‘चलो कहीं बाहर घूमने चलते हैं। घूमने का या टहलने का मतलब ही होता है चेंजिंग। घर में दिनभर रहते-रहते मन, शरीर आदि सब कुछ एकरसता के शिकार हो जाते हैं, उन्हें बदलाव चाहिए… नयापन चाहिए। किचन में रोजाना ही खाना बनाना, बर्तन मांजना, झाड़न्न्-पोंछा लगाना आदि सब ये घरेलू कार्य पत्नी को भीतर ही भीतर शुष्क और ईष्र्यालु बना देते हैं और इन बातों का सेक्स जीवन से गहरा संबंध् है। पत्नी अंदर ही अंदर टूट-बिखर रही है। खीझ, गुस्सा, ईष्र्या लिए घूम रही है, तो उसके साथ यौन-संबंध् बनाना या न बनाना बराबर है। वह पति को सेक्स में तृप्ति नहीं दे पाती है और उफपर से खीझ एवं गुस्से से पति को भर भी देती है। जब ऐसी पत्नी से पति यौन-संबंध् बनाता है, तो उसे आनंद नहीं मिलता है क्योंकि उसका मन तो पति से जुड़ा हुआ ही नहीं होता है। वह तो मानसिक तौर पर उसकी होती ही नहीं है, सिपर्फ शारीरिक रूप से उसकी होती है। तो शरीर का क्या करना जब मन कुंठित है और ईष्र्या एवं घृणा से भरा है।
अवि एक कुशल पति है। लता ने जब बाहर चलने की बात कही, तो लगे हाथ उसने रेस्टोरेंट चलने की भी बात कह दी। पत्नी जब घर से बाहर चलने की जिद करती है या आग्रह करती है, तो पति को समझ जाना चाहिए कि जरूर कोई न कोई बात है। पत्नी एक ही तरह की दिनचर्या से उफब गई है, बोर हो गई है। उसकी इस जिद को टालना ठीक नहीं है। अवि ने इस स्तर पर ही सोचा और लता को न सिपर्फ घुमाने ले गया, बल्कि रेस्टोरेंट भी ले गया और उसकी पसंद का ही भोजन उसे करवाया।
एक पति के लिए यह कोई बहुत बड़ी बात नही है, लेकिन इतना करने के बाद जो पत्नी से पति को मिलता है, वह बेशकीमती होता है। सेक्स जीवन में नयापन और बदलाव इन बातों से ही आता है। कहते हैं कि उम्र की ढलान में आकर पत्नी ईष्र्यालु हो जाती है। सेक्सी नहीं रह जाती है। जोर-जर्बदस्ती करो तो जली-कटी सुनाकर मूड ही खराब कर देती है, लेकिन यह सच नहीं है। ऐसी नौबत बढ़ती उम्र की वजह से नहीं आती है, बल्कि पति की वजह से पत्नी उसकी ओर से इतनी बेपरवाह हो जाती है। अक्सर देखा गया है जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है वैसे-वैसे पति अपनी पत्नी में रुचि लेना कम करता चला जाता है और उसमें एक ऐसी सोच कह लें या नजरिए का विकास होता चला जाता है कि पत्नी बच्चा पैदा कर-कर के बूढ़ी हो। अब उसमें पहले वाली बात नहीं रही। इस नजरिए से जब पति पत्नी को देखने-समझने लगता है तब उसकी रुचि पत्नी से कम उम्र की महिलाओं के प्रति बढ़ जाती है। कम उम्र की महिलाएं उसे मिलंे या न मिलें यह अलग बात है पर इतना तय है कि इस सोच की वजह से पत्नी के लिए वह नपुंसक जैसा ही हो जाता है। साल-छः माह में उसका पत्नी पर कभी दिल आता भी है, तो पत्नी कोई ध्यान नहीं देती है। पत्नी का ऐसा करना स्वाभाविक है। जब कोई पफीलिंग ही नहीं है, खिंचाव ही नहीं है तो पिफर सिपर्फ हवस मिटाने के लिए नजदीक आने से क्या लाभ।
अवि की तरह जो पति होते हैं, उनकी पत्नियां हर उम्र में कमसिन बनी रहती हैं, क्योंकि वे कमसिन हैं, सुंदर हैं, जवां हैं, इसकी अनुभूति उनके पति उन्हें कराते रहते हैं। किसी भी आदमी को बार-बार कहा जाए कि तुम बहुत कमजोर हो तो वह स्वयं को अकारण ही कमजोर महसूस करने लगेगा। गलत और सही दोनों बातों का दिमाग पर असर होता है। इसलिए पत्नी को कभी भी कमजोर न बताएं। कल और आज की तुलना कर उसकी सुंदरता और आकर्षण का निर्धरण न करें। वह जैसी कल थी आज भी वैसी ही है, इन शब्दों से उसका आकर्षण बना रहता है। वह हर पल स्वयं को जवान महसूस करती रहती है। सेक्स इन सारी बातों पर ही निर्भर करता है। घटता-बढ़ता भी इन्हीं से है।

रिश्तों में लाएं गर्माहट

रसना ड्राइंग रूम में आई, तो अरविंद ने कहा-‘टेबल पर खाना लगाओ। मम्मी-पापा के लिए भी खाना लगा देना।’
रसना वापस किचन में चली गई। टेबल पर सबके लिए खाना लगा दिया। रसना भी साथ में बैठकर खाना खाने लगी। अरविन्द ने अपनी मां की ओर देखते हुए कहा-‘किचन में आजकल तुम नहीं जाती हो क्या मां?’
‘नहीं, मैं नहीं जाती… आजकल तेरी बीवी ही खाना बना रही है।’
‘रसना कैसे परिवार की है, तुम्हें तो पता ही है। रसना यहां भी खाना अपने मां-बाप की पसंद का ही बनाती है। आज का खाना कितना मरा-मरा सा है।’
‘मरा-मरा…’ कहकर सास खूब जोर से हंसी। ससुर भी मुस्करा पड़े। अरविंद मन-ही-मन मजे ले रहा था।
रसना कुछ नहीं बोली। चुपचाप बेडरूम में आ गई। अरविंद आॅपिफस चला गया।
रात के आठबजे वह घर आया, तो रसना ने उससे कोई बात नहीं की। वह सीध्े बेडरूम में जाकर लेट गई। अरविंद ने उसे खाने पर बुलाया, तो उसने कह दिया कि मुझे बुखार है। तुम मां-बाबूजी के साथ खाना खा लो। अरविंद के पापा ने ध्ीमी आवाज में कहा-‘बहू तो दोपहर तक ठीक ही थी। वह शायद किसी बात को लेकर नाराज है।’ यह कहकर वह आगे बोले-‘देखो, तुम मां-बेटे बहू का मजाक बनाना छोड़ दो। वह कितनी अच्छी है कि अंदर-ही-अंदर घुटकर रह जाती है, पर जवाब नहीं देती है। सुबह का खाना इतना बुरा तो नहीं बना था कि तुम मां-बेटे ने बहू पर कटाक्ष किया…’ पापा के शब्द पूरे होते-होते अरविंद परेशान हो गया। वह ठीक से खाना भी नहीं खा सका।
वह बेडरूम में घुसते ही बोला-‘रसना, बुखार है तो दवा क्यों नहीं ली?’
‘दवा लेकर ही क्या करूंगी, जब तुम रोग देने के लिए हर पल तैयार बैठे रहते हो।’ रसना ने गुस्से से कहा।
‘यह क्या कह रही हो…?’ अरविंद यह कहते-कहते सकपका गया। रसना कापफी आवेश में थी-‘ठीक ही तो कह रही हूं। मम्मी-पापा कभी कुछ नहीं कहते। उनके सामने जब-तब मुझे अपमानित अगर कोई करता है, तो वह तुम हो… तुम… मैं अच्छा से अच्छा करने की कोशिश हमेशा करती हूं सिपर्फ तुम्हारी खातिर और तुम हो कि मेरी भावनाओं को समझते ही नहीं हो…’
‘साॅरी… आज पापा ने मुझे इस बात का अहसास करा दिया है कि मैं गलत हूं।’
‘पापा के अहसास करवाने पर तुम मुझसे मापफी मांग रहे हो, नहीं तो मुझे ऐसे ही सबके सामने नीचा दिखाते रहते?’
‘नहीं यार… तुम तो दिल से लगा बैठी हो।’
कहकर अरविंद ने रसना को अपनी तरपफ खींच लिया-‘यह समय गुस्सा करने के लिए नहीं होता है। शांत हो जाओ। मैं तो मजाक-मजाक में आज तक तुम्हें टोकता रहा… कोई-न-कोई कमेंट्स करता रहा… और तुम्हारे प्यार एवं जज्बात से महरूम रहा… अब बस भी करो…’ कहते हुए अरविंद ने रसना के गाल पर अपने होंठरख दिए। रसना का गुस्सा कापफूर हो गया। वह पति की पीठको ध्ीरे-ध्ीरे सहलाने लगी।
भावनाएं आहत होती हैं, दिल पर चोट पहुंचती है, अपमान मिलता है तो सेक्स जीवन भी इनसे किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही प्रभावित होता हैं। जो पति पत्नी को बात-बात पर टोकते रहते हैं, कोई भी बात कहने से पहले स्थान, समय और आस-पास खड़े लोगों का ध्यान नहीं रखते हैं, उनकी सैक्सुअल लाइपफ बहुत ही नाजुक दौर से गुजरती है। ऐसे पति की पत्नी जिद्दी, नकचढ़ी, गुस्सैल और निडर बन जाती है। वह सैक्सुअल लाइपफ में चाहकर भी कभी डूब नहीं पाती और पति को उलटा ही जवाब देती है, जिससे पति जान-बूझकर उसे सार्वजनिक जगहों पर जलील करने की कोशिश करता है और पत्नी को अपमानित या नीचा दिखाने की पति की यह कोशिश पत्नी को भूलकर भी पति के करीब पहुंचने नहीं देती है, सेक्स को महसूस करने या समझने की बात तो दूर की रही।
रसना अरविंद से तब तक दूर ही रही… एक पहली सी ही बनी रही और सशरीर अरविंद की बांहों में आने के बाद एक गुड़िया-सी बेजान अरविंद को लगती रही जब तक अरविंद ने इसकी वजह नहीं जानी और उससे साॅरी नहीं कहा। पति को पत्नी तो मिलेगी ही कितनी भी बदतमीजियां करने के बावजूद, लेकिन सेक्स भी मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं क्योंकि सेक्स एक जल प्रवाह सा सहज होता है, आजाद होता है और कोई बाध सहन नहीं करता है। और आप तो जानते ही हैं कि सेक्स पत्नी के ही इर्द-गिर्द घूमता है। वह पति से असंतुष्ट है, नाराज है, उसके मन में कोई गांठहै या पति द्वारा अपमानित होने का अहसास है तो वह तन-मन से पति से जुड़ नहीं पाती है। पति उस पर इसके लिए दबाब बनाता है, उसे यातनाएं देता है या कोसता है या उस पर बंदिशें लगाता है या सताता है तो पत्नी उसके प्रति विद्रोही हो जाती है। विद्रोही पत्नी कुछ भी कर सकती है, घर से भाग भी सकती है, पति का खून भी कर सकती है या पिफर पति से तलाक भी ले सकती है क्योंकि वह यौन-अतृप्ति के साथ-साथ पति की यातनाओं को भी भुगत रही होती है।
अरविंद के पापा ने समय रहते उसे हकीकत का दर्शन नहीं कराया होता तो शायद ही वह कभी पत्नी के प्रति सीरियस हो पाता। सुखद सेक्स-जीवन के लिए पत्नी को खुश रखना जरूरी होता है, क्योंकि यह एक के वश की चीज नहीं है। इसके लिए पत्नी का राजी होना या तहेदिल से तैयार होना आवश्यक है। झुकने, नरम पड़ने, सहने, त्याग करने, धैर्य धरण करने और सुनने-समझने से सेक्स उभर कर वैचाहिक-जीवन में आता है और पति-पत्नी दोनों को ही सहज और सपफल बनाता है।

टोकने की हैबिट

कांता, श्याम, मांजी तीनों खाने पर एक साथ बैठे। श्याम ने सबसे पहले खाना शुरू किया। अभी उसने दो-तीन कौर ही खाए थे कि कांता ने उसे टोक दिया-‘क्या बिल्ली की तरह चपर-चपर मुंह चला रहे हो। खाना खाने का यह कौन-सा तरीका है?’
श्याम चिढ़ गया-‘मैं तो बचपन से ही ऐसे ही खाना खाता आ रहा हूं। मां ने तो मुझे कभी टोका नहीं। तुम मां से क्या ज्यादा समझदार हो?’
‘तुम्हारी मां से तो मैं समझदार हूं ही… अध्किांश माएं लाड-प्यार में अपने बच्चों को गंदी आदतों के लिए नहीं टोकती हैं तो क्या पत्नियां भी नहीं टोकेंगी?ऐसे मुंह से आवाज निकाल कर मत खाया करो। अच्छा नहीं लगता है। सामने वालों को घिन्न-सी आती है।’ कांता एक सांस में ही बोल गई।
‘तुमने मेरी मां को भला-बुरा कहा… तुम्हें मेरा खाने का तरीका पसंद नहीं… तुम एक बहुत ही बदमिजाज और मुंहपफट औरत हो…’
‘तुमने मुझे बदमिजाज कहा…?मैं तुम्हें मापफ नहीं करूंगी। तुम एक निहायत ही जाहिल मर्द हो। अच्छी बातें तुम्हारे गले उतरती ही नहीं।’ कांता भी गुस्से से लाल और श्याम भी गुस्से से लाल…। बगल में बैठी मांजी शांत रहने का हाथ से इशारा करते हुए बोलीं-‘बहू, तुम दोनों में ही सहनशीलता नहीं है। कोई भी मां लाड-प्यार में आकर अपने बच्चे को बिगाड़ती नहीं या उसे बिगड़ने के लिए छोड़ नहीं देती है। तुम्हारा यह सोचना या कहना गलत है कि मुझमें अच्छे-बुरे की समझ नहीं है। चलो, मैं मान लेती हूं कि श्याम को मैंने खाना खाने का सलीका नहीं सिखाया, लेकिन तुममें भी तो कुछ गंदी आदतें हैं, जिन्हें श्याम भी बर्दाश्त कर जाता है और मैं भी बर्दाश्त कर जाती हूं। मैं बहुत दिनों से देख रही हूं तुम जिस गिलास से मुझे पानी पिलाती हो, उसी गिलास से मेरे पति को भी और पिफर मेरी बूढ़ी सास को भी… चकला-बेलन तो तुम कई-कई हफ्रतों तक धेती ही नहीं हो। क्या तुम्हारी मां ने यह नहीं सिखाया कि जूठे गिलास को धेकर दूसरों को पानी दिया जाता है?’
कांता और भी अध्कि उत्तेजित हो गई-‘मांजी, आप मुझमें कमी निकालकर अपने बेटे को गलत बातों के लिए शह दे रही हैं।’
‘मैं बेटे को उसकी इस आदत के लिए सही नहीं मान रही हूं और तुम्हें भी तुम्हारी आदत के लिए सही नहीं ठहरा रही हूं। मैं तो आईने के दोनों पहलुओं को तुम लोगों के सामने रखना चाहती हूं, ताकि तुम दोनों में ही एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की क्षमता विकसित हो…’ मांजी इतना कहकर खाने से उठगईं। श्याम भी खाना छोड़कर आॅपिफस चला गया। कांता ने भी खाना नहीं खाया।
ऐसा वातावरण सहनशीलता के अभाव से ही पैदा हुआ। सहनशीलता किसी भी व्यक्ति का सबसे बड़ा गुण है। यहां तीनों ही असहज और असहनशील व्यक्ति हैं। कांता ने पति को तब टोका जब वह खा रहा था। मांजी ने कांता की खामियां तब उजागर कीं, जब वह पति को टोक रही थी। श्याम ने अपनी गलती को स्वीकार न कर और भी बड़ी गलती कर दी।
आप जाने-माने दार्शनिकों या मनोवैज्ञानिकों के विचार पढ़ें, तो आपको सहज ही रूप से पता चल जाएगा कि गलत व्यक्ति को उसकी गलतियों के लिए कब टोकना श्रेयस्कर होता है। उनका मानना है कि कोई व्यक्ति गलत कार्यों में संलग्न है, तो उसे उस समय न टोकें। वह जो कर रहा है करने दें। बाद में उसके मूड और माहौल के मिजाज को देखकर सहज शब्दों में उसे उसकी गलती का अहसास करवाएं। आपका बोलने का लहजा ऐसा नहीं होना चाहिए कि उस व्यक्ति को लगे जैसे आप उसकी गलतियां जान-बूझकर निकाल रहे हैं।
कांता ने पति को उसकी गलत हैबिट के लिए तब टोका जब खाने पर बैठा था और मुंह से चपर-चपर की आवाज निकाल रहा था। इससे पति को लगा कि कांता सबके सामने उसे अपमानित करना चाहती है। सबके सामने किसी भी व्यक्ति की गलतियों को निकालने से वह अपनी गलतियां मानने की बजाए और गलतियां करता है। वह उनमें सुधर लाने की कोशिश नहीं करता है और उफपर से कांता ने एक गलती और भी कर दी कि उसने पति की गलतियों के लिए अपनी सास को दोषी ठहरा दिया। इसके बदले में सास ने कांता की गलतियों को उसके सामने ला दिया।
इस तरह की टोका-टाकी या गिले-शिकवे से आपस में मन-मुटाव और मतभेद पैदा होते हैं। बोलने का मन नहीं करता है। ईष्र्या और घृणा मन में जन्म ले लेती है। ये नकारात्मक चीजें आंखों को हमेशा गलत ही दिखाती हैं और दिमाग को गलत दिशा में सोचने पर मजबूर करती हैं। कांता की खूबसूरती श्याम को भला कभी नजर आ सकती है? बिलकुल ही नहीं। वह तो हमेशा उसे अपना प्रतिद्वंद्वी ही समझेगा। सास भी कांता को तहेदिल से कभी भी अपना नहीं पाएगी। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करने की सलाह हम नहीं दे रहे हैं। क्योंकि छोटी-छोटी बातें ही आगे चलकर अलगाव का कारण बन जाती हैं। अदालत में तलाक के केसों में से ज्यादातर केस ऐसे होते हैं, जिनके पीछे कोई बहुत बड़ी बात नहीं होती है। ‘वह शराब पीकर आते हैं और मुझसे संग-साथ कायम करना चाहते हैं, मुझे शराब की गंध् पसंद नहीं, मैं मना कर देती हूं तो वह मुझे पूरी रात सोने नहीं देते हैं, मुझे मजबूरन बरामदे में जाकर रात गुजारनी पड़ती है। वह खाना खाते समय दुनिया भर के तनाव पैदा करने वाली बातें लेकर बैठजाती है, मेरा खाना-पीना हराम हो गया है। वह गुटका दिन भर चबाते रहते हैं और जहां मन करता है वहीं थूक कर गंदगी पफैला देते हैं। मना करने पर झगड़ पड़ते हैं। मैं जो खाने में पसंद करता हूं, पत्नी उसके विपरीत खाना बनाती है और टोकने पर कहती है कि खाना है तो खाओ नहीं खाना है तो खुद बना लो इत्यादि छोटी-छोटी बातें समय के साथ-साथ बड़ी बनती चली जाती हैं और एक दिन उफबकर पति-पत्नी तलाक के लिए अदालत तक पहुंच जाते हैं या पिफर मानसिक रूप से स्वयं को एक-दूसरे से अलग कर लेते हैं।
ऐसी नौबत ही न आए, इसके लिए सही समय और मूड देखकर आप पति को या पत्नी को प्यार से समझाने का प्रयास करें। ऐसा नहीं है कि किसी में बदलाव नहीं लाया जा सकता है। जो लोग कहते हैं कि आदत छूटती नहीं हैं। मौत के साथ ही जाती है, हम इससे सहमत
नहीं हैं, क्योंकि हमने बहुतों को सुध्रते हुए देखा है। हालात अच्छे अच्छों को सुधर देता है। हम किसी के नजदीक पहुंच सकते हैं, तो सिपर्फ प्यार और सहानुभूति से… सहनशीलता और ध्ैर्य से…। आपमें अगर ये चारों चीजें नहीं हैं, तो आप विवाह का सुख भोग नहीं सकते हैं। आप विवाह तो कर सकते हैं, लेकिन ज्यादा दिन तक पति-पत्नी के रूप में एक साथ नहीं रह सकते हंै, क्योंकि इन चारों शब्दों के अभाव में आप एक अच्छी पत्नी या एक अच्छे पति साबित नहीं हो सकते हैं।
आपको शायद यह नहीं पता, एक अच्छे इंसान में ये चारों गुण होने जरूरी हैं। आज का जो पारिवारिक माहौल है, उसमें पलने-बढ़ने वाले लड़के-लड़कियों में इन चारों ही बातों का अभाव है। इनके बदले उनमें ईष्र्या, द्वेष, बदले की भावना व स्वार्थी भाव अध्कि हैं, जिनकी वजह से वे एक अच्छे पति-पत्नी साबित नहीं हो पाते हैं। आप एक अच्छा मनुष्य बनकर अपने जीवनसाथी को देखेंगे, समझेंगे और समझाएंगे, तो वह आपके अनुकूल बनने की कोशिश जरूर करेगा।
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पति को सुनाइए ही नहीं कुछ कीजिए भी

आज छोटू के स्कूल में पी.टी.एम. था। तुम स्कूल गई थी?’ नितेश ने आॅपिफस से घर आते ही सवाल कर दिया।
‘ध्ूप ही इतनी तेज थी कि बाहर निकलने का मन ही नहीं किया।’ मीता ने बड़ी ही लापरवाही से कहा।
‘यह कोई जवाब हुआ?कभी ध्ूप, कभी ठंड, कभी बारिश ये सब तो आती ही रहेंगी। मैं आॅपिफस नहीं गया था?दूसरी औरतें स्कूल नहीं गई थीं कि तुम ऐसी बात कर रही हो? छोटू की टीचर रास्ते में मिल गई थीं। वह बता रही थीं कि छोटू ने हर विषय में जीरो नंबर पाया है। खुद टी.वी. देखती हो और उसे भी दिखाती हो।’
‘तो तुम क्या चाहते हो, मैं बच्चों के चक्कर में दो घड़ी टी.वी. भी न देखूं?बच्चे पढ़ें या न पढ़ें, मुझसे ये सब नहीं होगा।’ मीता इतनी-सी बात पर बिगड़ गई। उसका मूड आॅपफ हो गया। नितेश ने टी.वी. उठाया और पफर्श पर पटक दिया। पल भर में ही घर का माहौल यु( का मैदान बन गया।
पति-पत्नी के बीच जब बच्चे आ जाते हैं, तब उनमें पहले जैसी बात नहीं रहती है। बच्चे की थोड़ी-सी भी असपफलता लड़ाई की वजह बनकर उनके संबंधें के बीच खड़ी हो जाती है। गुस्से से भरी पत्नी बर्तन पटकती है तो पति घर के कीमती सामान तोड़ डालता है।
बच्चों को लेकर मन में अध्कि सपने जो पति-पत्नी पालते हैं, वे तो बच्चों के किसी भी कार्य में जरा-सा भी पिछड़ जाने पर गुस्से में यह भी नहीं देखते हैं कि वे क्या करने जा रहे हैं। बच्चे उन दोनों के प्यार की बदौलत ही तो आते हैं। यदि बच्चे पर पत्नी ने ध्यान नहीं दिया या उसकी निगरानी करने में थोड़ी-सी चूक हो ही गई तो इसके लिए अपने बरसों के संबंधें को भुला देना कहां की बु(िमानी है?
पत्नी के स्थान पर जरा पति रहकर तो देखे, पिफर उसे पता चल जाएगा कि बच्चों को संभालना कितना कठिन होता है और घर का काम करना कितना थका देने वाला होता है। मीता सुबह के चार बजे ही बिस्तर छोड़ देती है, पिफर उसे एक मिनट की भी पफुर्सत नहीं मिलती है। दोपहर में सबके जाने के बाद अगर वह पफुर्सत के क्षणों में दो पल अपनी पसंद की जीवनशैली अपनाती है तो इसमें बुरा ही क्या है। स्कूल में पी.टी.एम. साढ़े आठबजे से बारह बजे तक था। नितेश चाहता तो पंद्रह-बीस मिनट का समय निकाल कर स्कूल जा सकता था। मीता छोटू को रोजाना स्कूल छोड़ने क्या जाती नहीं है कि उसने आते ही उस पर अपना रोब झाड़ना शुरू कर दिया?उसने गुस्से में आकर या एक-सी जीवनशैली से उफबकर कुछ गलत कह भी दिया तो टी.वी. पटकने की क्या जरूरत थी?आखिर नुकसान किसका हुआ। इस तरह की हरकतें अध्किांश पति करते हैं और ऐसे पति सुलझे हुए दिमाग के नहीं होते हैं। वेे एक तरह के मनोरोग से पीड़ित होते हैं, जो अपनी बात मनवाने के लिए घर के सामान तोड़ डालते हैं। वे यह समझते हैं कि सामान टूट जाएगा, तो पत्नी डरकर चुप हो जाएगी या कल से उससे बहस नहीं करेगी। उन्हें यह पता कहां होता है कि ऐसी हरकतों से पत्नी और भी अध्कि ईष्र्यालु, क्रोध्ी एवं बागी प्रवृत्ति की हो जाती है। ऐसे में वह उसकी जो इज्जत कर रही होती है, वह भी करना छोड़ देती है।
मनोवैज्ञानिकों का इस विषय में कहना है कि गाली-गलौज, मार-पीट, तोड़-पफोड़ का सहारा कमजोर दिमाग वाले पति लेते हैं, उनका सोचना होता है कि ऐसा करके वे पत्नी को अपने कदमों में झुका देंगे और जैसा वे कहेंगे, वह वैसा ही करेगी या उनके गलत-सलत कार्यों पर कोई ध्यान नहीं देगी। जबकि होता इसके विपरीत ही है, क्योंकि किसी को डरा-
ध्मका कर अच्छा इंसान नहीं बनाया जा सकता है। छोटू ने हर विषय में जीरो पाया है या वह पढ़ने में कमजोर है तो इसका मीता के टी.वी. देखने से क्या संबंध्?बच्चा पढ़ने में कमजोर है, उसके नंबर कम आए हैं, तो इसमें दोनों का ही दोष है।
किसी भी परिवार में अनुशासन सिपर्फ किसी एक के व्यवहार से नहीं आता है, इसके लिए पति-पत्नी दोनों को ही मेहनत करनी पड़ती है। घर में ऐसा सुखद और बढ़िया माहौल बनाना पड़ता है, जिसका सुंदर प्रभाव बच्चों के मन-मस्तिष्क पर पड़े।
आजकल अध्किांश लोग बच्चों को अच्छा इंसान बनाना तो चाहते हैं, लेकिन खुद को एक अच्छा मनुष्य बनाना नहीं चाहते हैं।
रीता ने वैभव के घर आते ही सवाल कर दिया-‘गरिमा को तो तुम्हें कुछ कहना ही नहीं है। वह स्कूल से घर रोजाना लेट आती है।’
‘तुम मां हो, उसके साथ ज्यादा समय बिताती हो। वह क्यों लेट आती है, तुम्हें इसका कारण मालुम होना चाहिए।’ वैभव यह कहते-कहते चुप हो गया।
‘पिता का कोई पफर्ज नहीं होता है?’
‘होता है… वही तो मैं निभा रहा हूं। रुपए-पैसे की व्यवस्था करना मेरा काम है और घर को चलाना-संभालना तुम्हारा काम है। बच्चों की और घर की जिम्मेदारी तो मैंने तुम पर छोड़ रखी है।’
‘घर के अंदर की है… बाहर की नहीं न? पिफर तुम गरिमा के स्कूल में जाकर क्यों नहीं पता लगाते हो कि वह घर लेट क्यों आती है।’
इसी बीच गरिमा वहां आ खड़ी हुई। वैभव ने प्रश्न कर दिया-‘मैं यह क्या सुन रहा हंू, तुम स्कूल से रोजाना लेट आती हो।’
‘ममा तो घर में रहती हैं। उन्हें क्या पता कि घर से स्कूल कितनी दूर है। न तो मेरे लिए रिक्शा किया है और न साइकिल ही है। पैदल आने में देर तो होगी ही…।’ गरिमा ने देर से घर आने का जो कारण बताया, वैभव ने पिफर आगे कुछ नहीं पूछा। हां, रीता ने पति को खरी-खोटी अवश्य ही सुना दी-‘ऐसे ही जिम्मेदारी निभाई जाती है?बेटी के लिए एक साइकिल भी नहीं खरीद सकते हो?’ रीता को कटाक्ष करने का मौका मिल गया था। वैभव गुस्सा हो गया। पिफर दोनों घंटे भर बहस करते रहे।
जरूरतें मेहनत करने के बाद भी आजकल पूरी नहीं हो रही हैं। पति-पत्नी अपनी जरूरतों के पूरी न होने पर जितने दुःखी नहीं होते हैं, उतने दुःखी बच्चों की जरूरतें पूरी न होने पर होते हैं। सबकी जरूरतें पूरी करना आज हर किसी के वश की बात नहीं है। महानगरों को छोड़कर बाकी सब स्थानों में रहने वाले पति-पत्नी में से प्रायः पति ही नौकरीशुदा होता है और पत्नी घर संभालती है। यही वजह है कि जहां दो-तीन या एक भी बच्चा है, वहां पति-पत्नी लड़ते-झगड़ते ही दिखाई देते हैं। पत्नी पति को सांस तक भी नहीं लेने देती है और हाड़तोड़ परिश्रम करने के बावजूद उसे पत्नी के ताने सुनने पड़ते हैं। पिफर ऐसे में हमेशा तनाव ही बना रहता है। पति को भला-बुरा कहने से अच्छा है कि पत्नी भी कोई ऐसा काम करे, जिससे आर्थिक हालात न सही, पति को कुछ सहारा तो मिले। वह सहारा मानसिक और शारीरिक दोनों ही हो सकता है। रीता और मीता अपने-अपने पतियों को सिपर्फ सुनाती ही हैं, कुछ करने के लिए तैयार नहीं हैं। आप इस खोल से बाहर आकर और कुछ नहीं तो घर के कार्य तो स्वयं अपने हाथों से करें। यदि संभव हो तो थोड़ा बहुत बाहर बाजार आदि के कार्यों में भी सहयोग कर सकती है।

न झगड़ें बच्चों के सामने

रागिनी ने आॅपिफस के लिए तैयार हो रहे विक्रम से कहा-‘आज जरा जल्दी आ जाना।’
‘क्यों, आज क्या बात है, भई? टिपिफन तैयार कर दिया?’ विक्रम ने कारण जानना चाहा तो रागिनी ध्ीमे स्वर में बोली-‘वाॅशिंग मशीन तीस प्रतिशत छूट पर मिल रही है। रुपए दोगे तभी तो मैं खरीदूंगी।’
‘चुप रह, पिफजूल की बातों में हमेशा लगी रहती है। घर में कोई वाॅशिंग मशीन नहीं आएगी… पैसे पेड़ पर पफलते हैं क्या?’ कहकर विक्रम आॅपिफस चला गया।
शाम को वह घर आया तो रागिनी ने चाय-पानी तो दिया लेकिन कोई बातचीत नहीं की। थोड़ी देर के बाद वह बेडरूम में आई तो चाय का कप खिड़की के पास देखकर भड़क उठी-‘चाय पीकर खिड़की के पास कप रख दिया। इतने थके तो नहीं हो कि किचन में ले जाकर नहीं रख सकते? बच्चे तुमसे ही तो गंदी आदतें सीख रहे हैं।’ रागिनी यह कहकर किचन में चली गई। टिपिफन खोला, पिफर बड़बड़ाने लगी-‘खाना तो खाना आता है और टिपिफन में पानी डालकर धेना नहीं आता… इसमें से कैसी दुर्गंध् आ रही है।’ रागिनी ने अजीब-सा मुंह बनाकर कहा तो विक्रम को भी गुस्सा आ गया-‘सुबह का गुस्सा इस समय उतार रही हो। जो लोग कमजोर होते हैं, वही अपनी भड़ास इस तरह गलत तरीके से निकालते हैं। वाशिंग मशीन उतना जरूरी भी नहीं है और पैसे भी इस समय नहीं हैं… दोनों ही बात है।’
यह कहकर विक्रम चुप हो गया। तभी बारह वर्षीय बेटे ने
आकर दस रुपए मांगे। विक्रम ने मना कर दिया-‘अभी खुले नहीं हैं, बाद में दे दूंगा…’
बेटा गुस्सा हो गया और जाकर किताब पलटने लगा। कोई दस मिनट के बाद विक्रम ने बेटे से पानी मांगा तो उसने यह कहकर टाल दिया-‘मैं पढ़ रहा हूं, पापा… मम्मी से मांग लो।’ विक्रम ने खुद उठकर पानी लिया, पिफर कहा-‘तुम मां-बेटे एक जैसे हो। वाॅशिंग मशीन लाने से मना कर दिया तो उसने मुझमें दोष निकालकर बदला ले लिया और तुझे दस रुपए नहीं दिए तो तूने पढ़ाई का बहाना कर पानी लाने से मना कर दिया, लेकिन मेरी मजबूरी को किसी ने भी समझा नहीं।’
विक्रम यह कहकर तनाव में आ गया। घर में पत्नी, बच्चे सभी थे, पर वह स्वयं को एकदम अकेला महसूस कर रहा था। घर में किसी से कुछ कहने या मांगने में जब संकोच महसूस हो तो पिफर आदमी अपनों के बीच अनजान और अकेला पड़ जाता है और वह उन्नति नहीं कर पाता है। उसके मन में यह सोच घर कर जाती है कि जब कोई मेरी सुनता ही नहीं है, कोई मेरा हमदर्द ही नहीं है और जरूरतें पूरी न कर पाने की स्थिति में हर कोई बदले की भावना मन में पाल ले तो पिफर मैं उन्नति के बारे में क्यों सोचूं? उन सब के लिए क्यों दिन-रात मरूं, जो अपने हैं ही नहीं।
आज अध्किांश पति-पत्नियों में इस तरह की समस्या है और उनकी इस समस्या का गलत प्रभाव बच्चों पर भी पड़ रहा है। विक्रम से बेटे ने रुपए मांगे। उसने देने से मना भी नहीं किया। बस खुले रुपए न होने की बात कही और बेटे के मन में उसके प्रति बदले की भावना घर कर गई। पानी मांगने पर उसने अपरोक्ष रूप से मना कर दिया कि मैं पढ़ रहा हूं। पत्नी की मांग पैसे न होने के कारण पूरी न कर सका तो उसने चाय पीकर कप खिड़की के पास क्यों रखा, टिपिफन धेया क्यों नहीं आदि बातें सुनाकर अपनी भड़ास निकाल कर ही दम लिया। ऐसा करना गलत है। आप किसी चीज की मांग करती हैं और पति पैसे न होने की बात बताकर मना कर देता है तो जो कहना हो उसी समय कहकर मामला रपफा-दपफा कीजिए। इस बात को खींचने की कोशिश मत कीजिए। खींचेंगी तो बात बिगड़ेगी। बच्चे नकल करने में बड़े ही निपुण होते हैं। आपके इस आचरण का वे भी नकल कर आप जैसा ही दुव्र्यवहार आपके साथ या आपके पति के साथ या पिफर किसी के भी साथ करने का प्रयास करेंगे, जो उनके भविष्य के लिए किसी भी रूप में सही नहीं होगा।
यह सोचने वाली बात है। विक्रम चाय पीने के बाद कप बेडरूम में शुरू से ही रखता आ रहा है। टिपिफन भी वह आॅपिफस से जूठा ही लेकर आता रहा है। रागिनी ने कभी भी तो इसका कोई विरोध् नहीं किया या बुरा-भला नहीं कहा। पिफर आज उसने हंगामा क्यों खड़ा किया?इससे तो यही बात सि( होती है न कि घर में वाॅशिंग मशीन लाने से पति ने मना कर दिया तो उसने पति को जलील करने का पफैसला कर लिया। जान-बूझकर उसने बच्चों के सामने उसे बुरा-भला कहा। बच्चे ने जब देखा कि पापा ने मां की मांग पूरी नहीं की तो उसने पापा के भी साथ कोई अच्छ व्यवहार नहीं किया पिफर मेरी मांग पूरी नहीं की तो मैं क्यों उन्हें पानी लाकर दूं। डायरेक्ट रूप से उसमें मना करने की हिम्मत नहीं थी तो उसने पढ़ाई की आड़ में मना करना सुरक्षित समझा। कल को यही बच्चा जब बड़ा हो जाएगा तब उसे किसी बहाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
ऐसी नौबत न आए, इसलिए यह आवश्यक है कि पति-पत्नी एक-दूसरे को समझें। ऐसे व्यवहार सिपर्फ पति-पत्नी तक ही सीमित नहीं रहते हैं, ध्ीरे-ध्ीरे पफैलते हुए बच्चों के दिलो दिमाग तक भी पहुंच जाते हैं, पिफर बाद में महसूस होने लगता है कि हमने जो भी आचरण एक-दूसरे के साथ किया उसे बच्चों ने भी ग्रहण कर लिया। पिफर भस्मासुर वाली स्थिति आ जाती है। अपने ही बच्चे माता-पिता को उंगली दिखाने लगते हैं और कहने लगते हैं कि ऐसे आंखें पफाड़कर क्या देख रहे हो… तुमने भी तो यही सब किया हुआ है।
पिफर अपनी गलती का अहसास पति-पत्नी को होने लगता है, लेकिन इस अहसास का कोई मूल्य नहीं रह जाता है। बेटे ने जब पानी देने से मना किया या कहा कि मम्मी से मांग लो, मैं पढ़ रहा हूं तो इस पर रागिनी को चुप्पी साध्ना नहीं चाहिए था। वह बच्चे को डांटती और उठकर पानी देने को कहती तो शायद बच्चा मां के आचरणों की नकल करने की गलती पिफर कभी नहीं कर पाता। कहने का तात्पर्य है कि दुनिया के क्या अमीर, क्या गरीब, क्या पढ़े, क्या अनपढ़ सभी पति-पत्नियांे में वैचारिक मतभेद होते हैं और जरूरतें पूरी न होने पर वे एक-दूसरे से नाराज भी होते हैं, पर ऐसी स्थिति में इस बात का ध्यान रखना बहुत ही जरूरी हो जाता है कि उनके झगड़ों का असर बच्चों पर न पड़े। वे इन से बिलकुल ही अनछुवे रहें और उनका प्यार, विश्वास दोनों के ही प्रति बना रहे तथा उनकी नजरों में पति-पत्नी आदर्श माता-पिता ही बने रहें। इसके लिए पति-पत्नी दोनों को ही मनमुटाव के पलों में भी हंसते हुए और सामान्य भाव से बच्चों के सामने मिलना आवश्यक है। बड़े होते बच्चों के सामने बेढंगे और अव्यावहारिक तरीके से लड़ना-झगड़ना या गालियां निकालना भी गलत साबित हो सकता है क्योंकि बच्चों में नकल करने की प्रवृत्ति होती है और उन्हें अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता है।
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कितना मीठा हमारा हनीमून?


होटल का शानदार बेडरूम… डबल बेड पर लाल कलर की चादर… उस पर बैठी अलका दोहरी हुई जा रही थी। खिड़कियों से सांय-सांय की आवाज करती हुई आ रही हवा बेडरूम में चारों तरपफ पफैलती जा रही थी। अलका इन दो-चार दिनों में भी मंजर से घुल-मिल नहीं पाई थी। मंजर ‘दस मिनट में आ रहा हूं’ कहकर गया था और आध्े घंटे के बाद भी नहीं लौटा था।
अलका को चिंता हो रही थी। तभी दरवाजा खुलने की आवाज हुई। अलका बेड से उतर कर खड़ी हो गई। मंजर उसके कंध्े पर हाथ रखकर बोला-‘मेरा इंतजार कर रही हो?’
‘तो और किसका इंतजार करूंगी?आप ही तो अब एकमात्रा मेरे अपने हैं।’ कहकर अलका ने अपना सिर मंजर के कंध्े पर रख दिया।
‘बनो मत… मुझे शादी के मंडप की घटना अभी तक याद है।’ मंजर यह बोलते-बोलते चुप हो गया।
‘किस घटना की बात कर रहे हैं?’ अलका आश्चर्य में पड़ गई।
‘तुम्हारी मां मुझे सोने की चेन दे रही थीं, लेकिन तुमने उन्हें मना कर दिया। तुम मुझे अपना भी कह रही हो और परायों-सा व्यवहार भी करती हो?’ मंजर के यह कहते हुए चेहरे पर गुस्सा उभर आया।
‘आपको पता नहीं न, मेरे मम्मी-पापा किन हालातों से गुजर रहे हैं। मुझसे छोटी दो बहनें घर में बैठी हैं। आपके पास सब कुछ है और पिफर आपको क्या कुछ नहीं मिला है।’ अलका ने मंजर को समझाया।
‘तो पिफर मैं तुम्हारा अपना कहां हुआ?तुम्हारे माता-पिता ही तो तुम्हारे लिए अपने हुए…?’ मंजर के इतना कहते ही अलका के चेहरे का रंग उड़ गया।
‘आप कैसे इंसान हैं… महज एक चेन के लिए हनीमून का मजा किरकिरा करने पर तुले हैं?’
‘देखो, मैं तुम्हारे इस हसीन चेहरे पर रीझने वाला नहीं… मुझे तो तुम्हारी मां से चेन चाहिए ही…’ मंजर अपनी बात पर अड़ गया।
‘अरे शांत हो जाइए…’ अलका ने यह कहकर मंजर को अपनी तरपफ खींचना चाहा तो मंजर ने उसका हाथ झटक दिया-‘शादी के मंडप में तुमने मेरा अपमान किया है। मुझसे दूर ही रहो।’
‘जब आपके मन में यही था तो हनीमून मनाने यहां क्यों आए?’
‘बहस मत करो…’ मंजर यह कहकर चुप लगा गया, लेकिन अलका चुप नहीं रही। उसने अपना सामान ब्रीपफकेस में रखा और होटल के कमरे से उसी पल निकल गई। वह पढ़ी-लिखी आज की माॅडर्न लड़की थी। एक सीमा तक ही पति की ज्यादतियों को बर्दाश्त कर सकती थी। ट्रेन पकड़कर सीध्े मायके चली गई।
हनीमून अच्छी तरह से मन गया। ऐसे हनीमून से क्या लाभ, जिसमें बदले की भावना हो और किसी अनजान जगह में लाकर जीवनसाथी को जलील करने की अभिलाषा हो। हनीमून पर नवयुगल जोड़े जीवन में मिठास घोलने के लिए जाते हैं न कि खटास घोलने के लिए?विवाह के मंडप में या विवाह तय होने के दौरान दोनों पक्षों में लेन-देन को लेकर जो भी बहस होती थी, पहले की लड़कियां उसमें दखल नहीं देती थीं, लेकिन आज की पढ़ी-लिखी लड़कियां अब आवाज उठाने लगी हैं और उन्हें जो अच्छा नहीं लगता है उसका विरोध् भी करने लगी हैं। यह सही भी है। मां-बाप के हालात से वाकिपफ आखिर उनसे बेहतर दूसरा कोई भी तो नहीं होता है। अलका ने मां को चेन देने से मना इसलिए किया क्योंकि घर में और दो जवान बहनें बैठी थीं। यह बात मंजर को अच्छी नहीं लगी तो यह उसकी सोच की गलती है। इससे यह सापफ हो जाता है कि वह एक अच्छा इंसान नहीं है और जो एक अच्छा इंसान नहीं है, वह भविष्य में एक अच्छा पति साबित भी तो नहीं हो सकता है। ऐसे हालात में अलका होटल से सीध्े अपने मायके चली गई तो उसने कोई गलत कार्य नहीं किया।
दोनों पक्षों के अभिभावकों की तू-तू, मैं-मैं का प्रभाव नवयुगल जोड़ों पर पड़ना नहीं चाहिए। उन्हें तो बस इस बात को महत्व देना चाहिए कि हम एक-दूजे से आत्मा, शरीर और मन से जब जुड़ गए हैं तो पिफर शादी के दौरान क्या हुआ, उस पर कोई ध्यान न देकर हमें बस इस बात पर ध्यान केंद्रित करना है, जिसके लिए हम घर से दूर किसी अनजान और खूबसूरत जगह पर हनीमून मनाने आए हैं। मंजर ने इन पिफजूल की बातों के लिए हनीमून जैसे सुअवसर को चुनकर अपने हनीमून की मिठास बढ़ाने की बजाए उसमें खटास ही घोलने का काम किया न? आप अपने हनीमून को खट्टे-मीठे स्वाद से रंगने का प्रयास कीजिए। उसमें केवल खट्टा रस भरने की भूल अब तो कम-से-कम मत ही कीजिएगा वर्ना आपकी दुल्हन कहीं अलका जैसी स्वाभिमानी हुई तो उसे आपको छोड़ते देर नहीं लगेगी।
अंजना शिमला हनीमून मनाने आई थी। कुशल चाय-नाश्ते का दौर खत्म होने के बाद बोला-‘याद है, तुम्हें जब मैं देखने गया था तब तुमने मेरी हाइट पर बड़े ही भद्दे कमेंट्स किए थे।’
‘हां, मैंने कहा था, यह ठिगना आदमी मुझे नापसंद क्या करेगा, लेकिन तुमने भी तो मुझ पर कमेंट्स किए थे?’ अंजना यह कहते-कहते गंभीर पड़ गई।
‘हां, मैंने भी कमेंट्स किए थे कि छोटी-छोटी आंखों वाली लड़की को मैं ठिगना दिख रहा हूं तो उसकी आंखों का यह दोष है।’
‘हिसाब-किताब तो उसी समय बराबर हो गया था। अब ऐसे हसीन और सेक्सी माहौल में उन पुरानी बातों की क्या जरूरत…?’ अंजना ने कुशल को देखते हुए कहा तो वह गुस्सा हो गया-‘तुमने मुझे ठिगना क्यों कहा?’
‘और तुमने मुझे छोटी-छोटी आंखों वाली क्यों कहा?’ बहस होते-होते इतनी बढ़ गई कि वे एक दूसरे पर कप, गिलास, तकिए उठा-उठाकर पफेंकने लगे। इसी पफेंका-पफेंकी में कांच का गिलास अंजना के सिर पर लग गया और वहां से खून रिसने लगा। वह बेहोश होकर पफर्श पर गिर पड़ी। बैरे ने देखा तो मैनेजर से बता दिया और मैनेजर ने पुलिस को पफोन कर दिया। जितनी जल्दी शादी हुई थी, उतनी जल्दी तलाक भी हो गया।
यह है आज के हनीमून की हकीकत… हनीमून पर जाएं या आप स्वर्ग जैसी खूबसूरत जगह पर जाएं जब तक आप दोनों में अच्छी समझ नहीं होगी, आप हसीन पलों के महत्व को समझ नहीं पाएंगे। हनीमून के हसीन पल शादी के दिनों में क्या हुआ, क्या नहीं हुआ इसके लिए नहीं होते। हनीमून पर तो आप एकांत के पलों को तलाशने जाते हैं। ऐसे पलों में नजदीक आने की बात होनी चाहिए। शरीर से आत्मा में उतर जाने की पहल होनी चाहिए और यहां इस सच्चाई को समझना भी आवश्यक है कि शादी के बाद स्त्राी-पुरुष एक-दूसरे के लिए बहुत ही निजी हो जाते हैं। शादी में क्या मिला और क्या न मिला, इससे अध्कि महत्वपूर्ण चीज एक-दूसरे का साथ पाना होता है और हनीमून के क्षणों में एक-दूसरे को पा लेना ही हनीमून को मीठा बनाता है। यदि ऐसा नहीं कर सके तो पिफर आप यहीं कहेंगे कि हनी, मीठा क्यों नहीं लगा?

Fee & Charges

Ashok Clinic is the oldest and reasonable Sexology Clinic and Care Centre in Delhi. The fee structure is designed in such a way that all sections of the society can take maximum benefits from the expertise of our Clinic.

Rs.500/- Consultancy Charges (valid for 6 months)

Rs.2000 to Rs.4500 for Medicine Charges per month (minimum)

You can also order the medicines and make cash payment on delivery.

In case of telephonic consultation and ordering the medicines, you can also RTGS the payment in any of the following banks and confirm to us.

 

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Psychological Counselling

psychological counsellingIt is quite natural that whenever somebody is suffering from sexual disorder, that person also develops psychological problems. Dr.Ashok Gupta along with his expert team of Dr.Rahul Gupta and Dr.Meena Gupta have been giving treating people and giving psychological counselling. Thousands of married couples, people with relationship problems and sexual addictions have been given counselling. Ashok Clinic Chandni Chowk and Branch Office at Pitam Pura are referred as perfect counselling and care centres.

Some of the subjects are mentioned below:

  • Married Couples Counselling
  • Premarital Sex
  • Relationships & Marriage
  • De-addiction of Masturbation
  • Porn Addiction
  • Sex Addiction
  • Hyper Sexual Behaviour
  • Hymenoplasty
  • Vaginoplasty
  • Circumcision
  • Penile Implants

Addictions

Anti Addiction MedicinesAshok Clinic has developed very effective medicines for people who are extremely Alcoholic and Smokers. We also have medicines which will help you control and stop the habit of chewing Gutka or Pan Masala.

These anti addiction medicines are Ayurvedic and hence 100% safe and without any side effects. Apart from this Dr.Ashok Gupta has treated many patients suffering from various drug-addictions. The expertise includes:

  • Alcohol Addiction
  • Drug Addiction
  • Smoking

Prostate & Urinary Problems

Prostate Urinary ProblemsAshok Clinic is extremely famous for the treatment of Prostate and other Urinary problems. Thousands of patients across the country and overseas have been benefited so far from the Ayurvedic Medicines of Dr.Ashok Gupta. Some of the normal problems faced by people are mentioned below. If you or somebody known to you is suffering from any such issues, Ashok Clinic is the best care centre.

  • Feeble stream of urine
  • Hesitancy of urine
  • Blood in urine
  • Pain or burning sensation while urinating
  • Stone in Kidney, Ureter or Bladder
  • Inability to control urine
  • Infection in recurrent urinary tract
  • Increased frequency of urination at night
  • Strain during urination
  • Feeling of incomplete urination