दम भी नहीं फुर्सत भी नहीं पत्नी कैसे रहेगी खुश

tired men

आज अध्किांश स्त्राी-पुरुष दिन भर काम को लेकर व्यस्त रहते हैं पर उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं होता है। घर में अचानक आयी बीमारी, किसी पर्व-त्योहार या बच्चों के भविष्य पर खर्च करने के लिए आपके पास पैसे न हों तो आप चिंतन-मनन कीजिए। ऐसे मौकों पर भी जब आपके हाथ में जीरो है तो पिफर आपसे आपके बीवी-बच्चे कैसे जुड़े रह सकते हैं?
चल रहे हो मंदिर?’ स्मिता ने बेडरूम में आते हुए पूछा।
नीतेन ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। स्मिता ने पिफर टोका, ‘चलो बच्चे भी जिद कर रहे हैं।’
‘तुम्हीं चली जाओ न उनको लेकर… देख नहीं रही हो कितना काम है।’ नीतेन ने काम की मजबूरी सामने रखी तो स्मिता बिदक गई, ‘काम तो बस एक तुम्हीं करते हो और मर्द तो करते ही नहीं हैं।’ यह कहकर स्मिता किचन में चली गई।
नीतेन भी किचन में आ गया और उसे समझाने लगा, ‘मंदिर ही जाना है न, बच्चों को लेकर घूम आओ।’
‘जाने दो, मैं भी नहीं जा रही। तुम्हें तो जीवन भर काम से पुफर्सत ही नहीं मिलनी है, तो क्या हम कहीं घूमने-पिफरने नहीं जाएंगे?’
‘मंदिर जाने पर मेरा सारा दिन खराब हो जाएगा। वहां लम्बी लाइन लगती है।’ नीतेन ने शुष्क लहजे में कहा तो स्मिता चीख पड़ी, ‘दिन-रात तुम काम-काम करते रहते हो… कुछ ऐसा किया भी है?जब भी पैसा मांगो जेब झाड़ देते हो। देखो, तुम मेरी बात मानो या न मानो लेकिन यह सच है कि तुम इस तरह से स्वयं को मेहनत की भट्ठी में झोंक कर हमारी तो क्या, अपनी जरूरतें भी पूरी नहीं कर सकोगे?’
नीतेन का चेहरा उतर गया। माथे पर पसीने की बूंदें उग आयीं। कड़वा सच व्यक्ति का ऐसा ही हाल कर देता है। नीतेन पत्नी के करीब आकर बोला, ‘गुस्से में ही सही, पर तुमने आज काम की बात की है। लेकिन मैं ऐसा करूं क्या कि नोटों की बारिश हो…?’
‘अपनी मेहनत को सही दिशा में लगाओ। अपने काम की कीमत को समझो। आगे बढ़ना है तो रिस्क लेना सीखो। बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनके पास टाइम भी होता है और पैसा भी होता है। तुम्हारे पास तो टाइम भी नहीं है और पैसा भी नहीं है। बच्चे छोटे हैं नहीं तो मैं भी कुछ करने के बारे में सोचती…’ कहकर स्मिता चुप हो गई।
नीतेन अगले पल ही मुस्करा पड़ा, ‘बच्चे तैयार हैं तो चलो अभी निकल चलते हैं मंदिर… काम तो होता रहेगा… समस्याएं पीछे लगी रहेंगी… पुफर्सत तो मरते दम तक नहीं मिलने वाली… लेकिन बच्चे तो हमेशा छोटे नहीं रहेंगे… तुम तो जवां नहीं रहोगी। मैं पैसे कमाने के लिए आज से देह का नहीं बल्कि दिमाग का इस्तेमाल करूंगा…’
नीतेन मंदिर जाने के लिए तैयार हो गया। स्मिता उसे अच्छी लगने लगी। काम का तनाव नीतेन के दिमाग से छंट गया।
टाइम और काम को लेकर अध्किांश पति अपनी पत्नी को
नाराज कर देते हैं। आज उन्हीं के टाइम और काम को सुना या बर्दाश्त किया जाता है जो मोटी रकम कमाते हैं। ऐसे पतियों की बातें पत्नियां
नहीं सुनतीं, जो दिन-रात मेहनत तो करते हैं पर उसके हिसाब से
कमाते नहीं हैं।
यह कुछ हद तक सही भी है। पति दिनभर आॅपिफस में हाड़तोड़ मेहनत कर घर आया और आते ही पुनः काम करने बैठगया। पत्नी ने पैसे मांगे या बच्चों ने कोई चीज खरीदने की जिद की और पति ने पैसे और पुफर्सत न होने का रोना रोकर उन्हें झिड़क दिया तो ऐसे में पति की खैर नहीं है। उसे न तो पत्नी बर्दाश्त करेगी और न ही बच्चे ही ज्यादा देर तक बर्दाश्त करेंगे। स्मिता ने मंदिर चलने की बात की तो नीतेन ने पैसे और पुफर्सत न होने का बहाना कर टरकाना चाहा। स्मिता का मूड खराब हो गया। उसने नीतेन को यह जतला दिया कि चैबीस घंटे तुम काम करते हो लेकिन बदले में पाते क्या हो? न तो तुम्हारे पास हमारी जरूरतों के लिए पैसे होते हैं और न टाइम ही होता है। तुम स्वयं न तो टाइम से भोजन करते हो और न सोते-जागते ही हो। गुस्से में कही गई पत्नी की बातें नीतेन को शुरू-शुरू में बुरी तो लगीं, पर अगले पल ही वह यह सोचने पर मजबूर हो गया कि बात तो स्मिता ठीक ही कह रही है। मेहनत और काम के हिसाब से जब आमदनी न हो तो आदमी को थकान व तनाव ही मिलता है और पत्नी एवं बच्चों की जरूरतें तथा शौक पूरे न होने पर उनकी नाराजगी और झिड़कियां अलग से सहनी पड़ती हैं।
यह सच है, उस काम को करके आदमी कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता, जिसका मूल्यांकन वह नहीं कर पाता है। आज अध्किांश स्त्राी-पुरुष दिन भर काम को लेकर व्यस्त रहते हैं पर उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं होता है। घर में अचानक आयी बीमारी, किसी पर्व-त्योहार या बच्चों के भविष्य पर खर्च करने के लिए आपके पास पैसे न हों तो आप चिंतन-मनन कीजिए। ऐसे मौकों पर भी जब आपके हाथ में जीरो है तो पिफर आपसे आपके बीवी-बच्चे कैसे जुड़े रह सकते हैं?आप बातों से तो उन्हें खुश कर सकते नहीं। कोई भी व्यक्ति बीवी-बच्चों की हसरतों को जानबूझ कर तो मसलना चाहता नहीं। उसके पीछे ठोस कारण होता है। हसरतें पूरी न करने का कारण या तो काम की व्यस्तता हो सकती है या ध्नाभाव हो सकता है। काम की व्यस्तता से कैसे छुट्टी मिलेगी और
ध्नाभाव से कैसे पीछा छूटेगा यह सोचना सिपर्फ पति का ही नहीं, बल्कि पत्नी का भी काम है। दोनों मिल-बैठकर बात कर सकते हैं तो अवश्य ही कोई हल निकल सकता है।
पत्नी पति की व्यस्तता और ध्नाभाव से खपफा होने की बजाए स्मिता की तरह बात करने की कोशिश करती है तो पति यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि उन्नति का आखिर सही रास्ता क्या है?सोचने से ही बात बनती है, समझाने और समझने से ही उम्मीद की लौ नजर आती है। स्मिता ने समझाया और नीतेन ने समझा। समझने की बजाए वह झगड़ पड़ता तो समस्या और बढ़ जाती। आप सदा अपनी जगह पर बीवी-बच्चों को रखकर सोचिए। घर में एक जगह पर रहकर वे उफब जाते हैं, इसीलिए वे पर्व-त्योहार या किसी पार्टी-पफंक्शन के अवसर पर आपसे जिद करते हैं, आप ऐसे मौकों पर भी असमर्थता जताते हैं तो पिफर आपकी कीमत उनकी नजरों में कोई खास नहीं रह जाती है। अपने प्रति उनकी उम्मीद को बनाए रखने के लिए मेहनत और आमदनी में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, वरना आप नकार दिये जाएंगे।

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