कितना मीठा हमारा हनीमून?


होटल का शानदार बेडरूम… डबल बेड पर लाल कलर की चादर… उस पर बैठी अलका दोहरी हुई जा रही थी। खिड़कियों से सांय-सांय की आवाज करती हुई आ रही हवा बेडरूम में चारों तरपफ पफैलती जा रही थी। अलका इन दो-चार दिनों में भी मंजर से घुल-मिल नहीं पाई थी। मंजर ‘दस मिनट में आ रहा हूं’ कहकर गया था और आध्े घंटे के बाद भी नहीं लौटा था।
अलका को चिंता हो रही थी। तभी दरवाजा खुलने की आवाज हुई। अलका बेड से उतर कर खड़ी हो गई। मंजर उसके कंध्े पर हाथ रखकर बोला-‘मेरा इंतजार कर रही हो?’
‘तो और किसका इंतजार करूंगी?आप ही तो अब एकमात्रा मेरे अपने हैं।’ कहकर अलका ने अपना सिर मंजर के कंध्े पर रख दिया।
‘बनो मत… मुझे शादी के मंडप की घटना अभी तक याद है।’ मंजर यह बोलते-बोलते चुप हो गया।
‘किस घटना की बात कर रहे हैं?’ अलका आश्चर्य में पड़ गई।
‘तुम्हारी मां मुझे सोने की चेन दे रही थीं, लेकिन तुमने उन्हें मना कर दिया। तुम मुझे अपना भी कह रही हो और परायों-सा व्यवहार भी करती हो?’ मंजर के यह कहते हुए चेहरे पर गुस्सा उभर आया।
‘आपको पता नहीं न, मेरे मम्मी-पापा किन हालातों से गुजर रहे हैं। मुझसे छोटी दो बहनें घर में बैठी हैं। आपके पास सब कुछ है और पिफर आपको क्या कुछ नहीं मिला है।’ अलका ने मंजर को समझाया।
‘तो पिफर मैं तुम्हारा अपना कहां हुआ?तुम्हारे माता-पिता ही तो तुम्हारे लिए अपने हुए…?’ मंजर के इतना कहते ही अलका के चेहरे का रंग उड़ गया।
‘आप कैसे इंसान हैं… महज एक चेन के लिए हनीमून का मजा किरकिरा करने पर तुले हैं?’
‘देखो, मैं तुम्हारे इस हसीन चेहरे पर रीझने वाला नहीं… मुझे तो तुम्हारी मां से चेन चाहिए ही…’ मंजर अपनी बात पर अड़ गया।
‘अरे शांत हो जाइए…’ अलका ने यह कहकर मंजर को अपनी तरपफ खींचना चाहा तो मंजर ने उसका हाथ झटक दिया-‘शादी के मंडप में तुमने मेरा अपमान किया है। मुझसे दूर ही रहो।’
‘जब आपके मन में यही था तो हनीमून मनाने यहां क्यों आए?’
‘बहस मत करो…’ मंजर यह कहकर चुप लगा गया, लेकिन अलका चुप नहीं रही। उसने अपना सामान ब्रीपफकेस में रखा और होटल के कमरे से उसी पल निकल गई। वह पढ़ी-लिखी आज की माॅडर्न लड़की थी। एक सीमा तक ही पति की ज्यादतियों को बर्दाश्त कर सकती थी। ट्रेन पकड़कर सीध्े मायके चली गई।
हनीमून अच्छी तरह से मन गया। ऐसे हनीमून से क्या लाभ, जिसमें बदले की भावना हो और किसी अनजान जगह में लाकर जीवनसाथी को जलील करने की अभिलाषा हो। हनीमून पर नवयुगल जोड़े जीवन में मिठास घोलने के लिए जाते हैं न कि खटास घोलने के लिए?विवाह के मंडप में या विवाह तय होने के दौरान दोनों पक्षों में लेन-देन को लेकर जो भी बहस होती थी, पहले की लड़कियां उसमें दखल नहीं देती थीं, लेकिन आज की पढ़ी-लिखी लड़कियां अब आवाज उठाने लगी हैं और उन्हें जो अच्छा नहीं लगता है उसका विरोध् भी करने लगी हैं। यह सही भी है। मां-बाप के हालात से वाकिपफ आखिर उनसे बेहतर दूसरा कोई भी तो नहीं होता है। अलका ने मां को चेन देने से मना इसलिए किया क्योंकि घर में और दो जवान बहनें बैठी थीं। यह बात मंजर को अच्छी नहीं लगी तो यह उसकी सोच की गलती है। इससे यह सापफ हो जाता है कि वह एक अच्छा इंसान नहीं है और जो एक अच्छा इंसान नहीं है, वह भविष्य में एक अच्छा पति साबित भी तो नहीं हो सकता है। ऐसे हालात में अलका होटल से सीध्े अपने मायके चली गई तो उसने कोई गलत कार्य नहीं किया।
दोनों पक्षों के अभिभावकों की तू-तू, मैं-मैं का प्रभाव नवयुगल जोड़ों पर पड़ना नहीं चाहिए। उन्हें तो बस इस बात को महत्व देना चाहिए कि हम एक-दूजे से आत्मा, शरीर और मन से जब जुड़ गए हैं तो पिफर शादी के दौरान क्या हुआ, उस पर कोई ध्यान न देकर हमें बस इस बात पर ध्यान केंद्रित करना है, जिसके लिए हम घर से दूर किसी अनजान और खूबसूरत जगह पर हनीमून मनाने आए हैं। मंजर ने इन पिफजूल की बातों के लिए हनीमून जैसे सुअवसर को चुनकर अपने हनीमून की मिठास बढ़ाने की बजाए उसमें खटास ही घोलने का काम किया न? आप अपने हनीमून को खट्टे-मीठे स्वाद से रंगने का प्रयास कीजिए। उसमें केवल खट्टा रस भरने की भूल अब तो कम-से-कम मत ही कीजिएगा वर्ना आपकी दुल्हन कहीं अलका जैसी स्वाभिमानी हुई तो उसे आपको छोड़ते देर नहीं लगेगी।
अंजना शिमला हनीमून मनाने आई थी। कुशल चाय-नाश्ते का दौर खत्म होने के बाद बोला-‘याद है, तुम्हें जब मैं देखने गया था तब तुमने मेरी हाइट पर बड़े ही भद्दे कमेंट्स किए थे।’
‘हां, मैंने कहा था, यह ठिगना आदमी मुझे नापसंद क्या करेगा, लेकिन तुमने भी तो मुझ पर कमेंट्स किए थे?’ अंजना यह कहते-कहते गंभीर पड़ गई।
‘हां, मैंने भी कमेंट्स किए थे कि छोटी-छोटी आंखों वाली लड़की को मैं ठिगना दिख रहा हूं तो उसकी आंखों का यह दोष है।’
‘हिसाब-किताब तो उसी समय बराबर हो गया था। अब ऐसे हसीन और सेक्सी माहौल में उन पुरानी बातों की क्या जरूरत…?’ अंजना ने कुशल को देखते हुए कहा तो वह गुस्सा हो गया-‘तुमने मुझे ठिगना क्यों कहा?’
‘और तुमने मुझे छोटी-छोटी आंखों वाली क्यों कहा?’ बहस होते-होते इतनी बढ़ गई कि वे एक दूसरे पर कप, गिलास, तकिए उठा-उठाकर पफेंकने लगे। इसी पफेंका-पफेंकी में कांच का गिलास अंजना के सिर पर लग गया और वहां से खून रिसने लगा। वह बेहोश होकर पफर्श पर गिर पड़ी। बैरे ने देखा तो मैनेजर से बता दिया और मैनेजर ने पुलिस को पफोन कर दिया। जितनी जल्दी शादी हुई थी, उतनी जल्दी तलाक भी हो गया।
यह है आज के हनीमून की हकीकत… हनीमून पर जाएं या आप स्वर्ग जैसी खूबसूरत जगह पर जाएं जब तक आप दोनों में अच्छी समझ नहीं होगी, आप हसीन पलों के महत्व को समझ नहीं पाएंगे। हनीमून के हसीन पल शादी के दिनों में क्या हुआ, क्या नहीं हुआ इसके लिए नहीं होते। हनीमून पर तो आप एकांत के पलों को तलाशने जाते हैं। ऐसे पलों में नजदीक आने की बात होनी चाहिए। शरीर से आत्मा में उतर जाने की पहल होनी चाहिए और यहां इस सच्चाई को समझना भी आवश्यक है कि शादी के बाद स्त्राी-पुरुष एक-दूसरे के लिए बहुत ही निजी हो जाते हैं। शादी में क्या मिला और क्या न मिला, इससे अध्कि महत्वपूर्ण चीज एक-दूसरे का साथ पाना होता है और हनीमून के क्षणों में एक-दूसरे को पा लेना ही हनीमून को मीठा बनाता है। यदि ऐसा नहीं कर सके तो पिफर आप यहीं कहेंगे कि हनी, मीठा क्यों नहीं लगा?

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