इस डिब्बे में क्या है?’ आॅपिफस से आए पति से शुचिता ने पूछा। पति डिब्बे से साड़ी निकाल कर बोला-‘साड़ी है। तुम्हारे पास साड़ियां गिनी चुनी ही थीं, इसीलिए लेता आया। तुम्हें तो पसंद है न?’
‘तुम कभी मेरे लिए कोई चीज खराब लाते हो जो यह खराब
होगी। जब से मेरा विवाह हुआ है, मैं कपड़ों के मामले में तुम पर ही तो निर्भर हूं।’
शुचिता ने यह कहकर पति को प्यार से गले लगा लिया।
रात अच्छी गुजरी। सुबह बाथरूम में घुसते हुए पति चिल्लाया-‘तौलिया दे दो।’
‘बाथरूम में तुम्हारी जरूरत के सारे सामान मैंने पहले से ही रख दिए हैं।’
शुचिता किचन से ही बोल कर चुप हो गई। पति नहाकर बेडरूम में आया तो शुचिता ने गोभी पनीर के परांठे खाने की मेज पर रख दिए। पति खाने लगा।
शुचिता ने पूछा-‘परांठे स्वादिष्ट बने हैं?’
‘तुम्हारे हाथ का कोई भी खाना कभी खराब बनता है। बहुत
बढ़िया… मुझे परांठे बहुत पसंद आए।’
‘सच बोल रहे हो?’
‘क्या भोजन के मामले में शादी से पहले मैं मां पर निर्भर था और अब तुम पर निर्भर हूं।’ पति ने बड़ी ही सहजता से कहा।
शुचिता हंसने लगी-‘अच्छी बात है। तुम्हें भोजन मेरी पसंद का अच्छा लगता है और मुझे परिधन तुम्हारी पसंद के अच्छे लगते हैं…’
‘इसमें बुरा भी क्या है। हम इसी बहाने एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते तो हैं।’
‘अच्छा, मुझे याद आया… मेरी एक सहेली के यहां जन्मदिन की पार्टी है। तुम तो देर से आओगे। मैं विमला आंटी को चाबी देकर चली जाउफंगी।’
‘ठीक है।’
‘तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा न?’
‘बुरा क्यों लगेगा। इतनी आजादी तो तुम्हें मिलनी ही चाहिए। आखिर तुम पत्नी हो कोई गुलाम तो नहीं।’
‘मुझे आने में देर हो जाए तो…?’
‘कोई बात नहीं। इतना तो चलता ही है। वैसे भी पार्टी-पफंक्शन से आने में देर हो ही जाती है। मैं भी तो कहीं जाता हूं तो देर हो जाती है। जब तुम बुरा नहीं मानती, तो मैं क्यों बुरा मानूंगा…’ पति यह कहकर आॅपिफस चला गया।
पति-पत्नी के रिलेशन इतने सापफ-सुथरे और खुले हुए होने चाहिए। जहां इस तरह की सोच वाले पति-पत्नी होते हैं, वहां पिफजूल की बहसबाजी, तनाव या झगड़े पैदा नहीं होते हैं तथा हमेशा शांत माहौल बना रहता है। पति-पत्नी के रिश्ते पर जब पुरुषवादी सोच हावी हो जाती है तब पत्नी घुट-घुट कर जीने लगती है।
तुम किसी से बात नहीं करोगी। जहां भी जाओगी मेरे साथ जाओगी। तुम्हारा हंसना-बोलना सिपर्फ मेरे साथ होगा। आॅपिफस से जल्दी घर आ जाना आदि हिदायतें अध्किांश पति पत्नियांे को देते हैं। पत्नियां भी इस मामले में आज पीछे नहीं हैं-छः बजे आॅपिफस बंद होता है तो साढ़े छः बजे तक घर आ जाओगे इत्यादि हिदायतें पत्नियां भी पति को देती हैं।
इन हिदायतों से क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि आज पति-पत्नी एक-दूसरे से कितना डरे हुए हैं। उन्हें वैवाहिक जीवन को लेकर कितनी चिंता है कि न जाने कब पति या पत्नी छिटक कर कहीं दूर हो जाए।
ऐसी सोच तभी पैदा होती है जब वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होते हैं। किसी का किसी से मतलब नहीं होता है। पसंद-नापसंद आपस में नहीं मिलती है या पिफर वे एक-दूसरे के साथ स्वयं को सुविधजनक स्थिति में नहीं पाते हैं। निर्भरता वैवाहिक जीवन की जान होती है। शुचिता के लिए पति कोई भी चीज लाता है तो वह कोई आलोचना या समालोचना न कर सहर्ष ही स्वीकार कर लेती है। पति भी आंखें बंद कर शुचिता की कोई भी बात मान लेता है। उन्हें एक-दूसरे पर पूरा भरोसा है और यह भरोसा एक या दो दिन में पैदा नहीं होता है, इसके लिए पति-पत्नी को सालों मेहनत करनी होती है। अपने जीवनसाथी को विश्वास दिलाना होता है कि हम एक-दूजे के लिए बने हैं। हमारे रिश्ते में छल-कपट नहीं चलेगा। शुचिता को पार्टी में अकेले जाने की इजाजत पति ने यही सोचकर दी कि शुचिता को रिश्तों की अहमियत का ज्ञान है।
पार्वती अपने पति के साथ स्वयं को बिलकुल ही सहज महसूस करती है, क्योंकि पति पार्वती के गुणों को देखकर पफूल की तरह खिल उठता है और अवगुणों पर कोई ध्यान न देकर सिपर्फ उसे जतला देता है कि यह पार्वती के लिए ठीक नहीं है।
सहजता वहीं पर पैदा होती है, जहां पर एक-दूसरे को ‘प्वाइंट आउट’ करने की परंपरा नहीं होती है। आदमी असहज स्वयं को वहीं महसूस करता है, जहां भरी महपिफल में भी पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। लोगों के बीच पति या पत्नी को जलील एवं लज्जित करना मूर्खता है, इससे लज्जित करने वाले और लज्जित होने वाले दोनों की ही छवि खराब होती है और कुछ भी हाथ नहीं लगता है। एक-दूसरे के साथ स्वयं को सुविधजनक स्थिति में महसूस करना भी पति-पत्नी के लिए आवश्यक है। ऐसे हालात आजादी से पैदा होते हैं। शुचिता ने पति से जब यह कहा कि वह एक पार्टी में जाना चाहती है और आने में देर होने पर वह नाराज तो नहीं होगा पति ने सहजता से उसे अनुमति दे दी। आजकल ऐसे पति बहुत ही कम हैं। उनकी तरपफ से पत्नी को थोड़ी-सी भी आजादी नहीं मिली हुई है। जब कामकाजी पत्नी को जल्दी घर आने की सलाह दी जाती है तो भला पत्नी को अकेले किसी पार्टी-पफंक्शन में कैसे भेजा जा सकता है और भेजा भी जा सकता है तो घर देर से लौटने की बात कबूल नहीं की जा सकती है। इतनी आजादी तो पत्नी को मिलनी ही चाहिए कि वह भी एक सामाजिक प्राणी के रूप में सांस ले सके। दिन-रात घर के कार्यों में लगे रहना और पफुर्सत के क्षणों में घर में बैठकर मक्खी मारते रहना एक स्त्राी के स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है। वह ऐसे में मानसिक रोगी हो सकती है। उदासीनता से घिर सकती है। जीवन से निराश हो सकती है। पति के प्रति कठोर हो सकती है। पत्नी को उचित आजादी और खुलापन देकर उसे सहज बनाए रखिए।

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